जस्टिस एस. एम. मोदक
बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस एस.एम. मोदक ने एक अहम फैसला देते हुए कहा कि पत्नी के रंग-रूप, खाना बनाने को लेकर ताना मारना और दूसरी शादी की धमकी देना क्रूरता नहीं है। कानून के तहत इसे आपराधिक उत्पीड़न नहीं माना जाएगा। यह वैवाहिक जीवन का हिस्सा है। ऐसी बातों को केवल वैवाहिक जीवन के उत्पन्न झगड़े के रूप में देखा जा सकता है।
मामला 31 जनवरी 1998 का है। सातारा के रहनेवाले सदाशिव रूपनवर की 22 वर्षीय पत्नी प्रेमा अचानक अपने ससुराल से गायब हो गई थी। बाद में उसका शव पास के ही एक कुएं से बरामद हुआ। प्रेमा के परिवार ने पति और ससुर पर उत्पीड़न और आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया था। सदाशिव पर आरोप था कि वह खाना बढ़िया नहीं बनाने को लेकर कटाक्ष करता था। उसके सांवलेपन को लेकर फब्तियां कसता था और दूसरी शादी कर लेने की धमकी देता था। इस मामले में सत्र न्यायालय ने सदाशिव को दोषी मानते हुए एक साल की सजा धारा 498-A (क्रूरता) और पांच साल की सजा धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाने) के तहत सुनाई गई थी। सदाशिव ने उस सजा को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
न्यायमूर्ति एस.एम. मोदक की एकल पीठ ने 11 जुलाई को सत्र न्यायालय के निर्णय को पलटते हुए स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि कथित उत्पीड़न और आत्महत्या के बीच सीधा संबंध था। कोर्ट ने कहा कि पत्नी के सांवले रंग को लेकर ताना मारना या खाना पकाने के तरीके की आलोचना करना वैवाहिक जीवन में होने वाली सामान्य कहासुनी हो सकती है, लेकिन इसे आत्महत्या के लिए उकसाने जैसा गंभीर अपराध नहीं माना जा सकता। यह आपराधिक कानून तब माना जाएगा, जब पत्नी के पास उत्पीड़न के कारण अपनी जान देने के अलावा कोई दूसरा विकल्प न बचे।
जस्टिस एस.एम. मोदक ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट को यह स्पष्ट रूप से पता था कि धारा 498-A के Explanation (a) में कहा गया कि इच्छापूर्वक किया गया व्यवहार उस स्तर का होना चाहिए, जो गंभीर हो। “ट्रायल कोर्ट ने तीन गवाहों के बयान के आधार पर प्रताड़ना को गंभीर स्तर का नहीं माना। यहां तक कि यदि प्रताड़ना के कारण स्वीकार भी कर लिए जाएं, तब भी यह मामला 498-A के अंतर्गत नहीं आता। इसलिए ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष रद्द किया जाना चाहिए।”

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