अकेला
हम ‘मुस्लिम तुष्टिकरण, मुस्लिम तुष्टिकरण’ कहकर कांग्रेस को कोसते रह गए परन्तु कांग्रेस ने संवैधानिक रूप से भारत को मुस्लिम राष्ट्र बना दिया था। बस घोषणा करना बाकी था। कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अनौपचारिक रूप से इसकी घोषणा कर दी थी कि भारत के संसाधनों पर पहला हक़ मुसलमानों का है।
बांग्लादेश के हिंदू अल्पसंख्यकों पर मुस्लिमों के अत्याचार को पड़ोसी मुल्क का अंदरूनी मामला बताने वाली कांग्रेस पार्टी के नेता फलस्तीन को लेकर जार-जार आंसू बहाए जा रहे हैं! मणिपुर और निकोबार आइलैंड पर ‘मुखर’ होकर समाचार पत्रों में लेख लिखने वाली कांग्रेस की आजीवन अघोषित अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी फलस्तीन के लिए अपना ‘पथरीला मौन’ त्याग कर अखबार के पन्ने अपने आंसुओं से तरबतर करने में देर नहीं लगाई… उधर, वायनाड की मजबूरी के चलते प्रियंका गांधी को भी फलस्तीन प्रेम छलकाना पड़ा! ये नेता और इनकी पार्टी हमास के मचाए कत्लेआम के वक्त कहाँ थे, इसका जवाब ‘इजराइली’ भले मांगें, लेकिन ‘फलस्तीनियों’ को इसका जवाब नहीं चाहिए… उन्हें चाहिए तो सिर्फ अंधा समर्थन, जिसके बदले वो आपको समर्थन देंगे…
दरअसल, फलस्तीन हो, पाकिस्तान हो या बांग्लादेश या और कोई मुल्क… मुसलमानों के पास मुस्लिम ब्रदरहुड (या उम्मा) नाम की ऐसी ग्लोबल ‘करेंसी’ है, जो चुनाव में ‘वोट’ के रूप में भारत में कभी भी, कहीं भी भुनाई जा सकती है, यह बात कांग्रेस शुरू से और अच्छी तरह से जानती है। इसलिए मुद्दा गलत हो या सही, मुस्लिमों को आंख मूंदकर और मुंहमांगा समर्थन देकर कांग्रेस बदले में क्या पाना चाहती है, यह अब कुछ मूर्ख सेकुलर टाइप के चूरनचाट लोगों को छोड़कर, किसी से भी छिपा नहीं है।
जाहिर है, कांग्रेस को चाहिए मुस्लिम वोट… इसके लिए वह कुछ भी कर सकती है… हमास के बजाय इजराइल पर सवाल खड़े कर सकती है, पुलवामा और पहलगाम होने पर पाकिस्तान के बजाय भारत और उसकी फौज को ही दोषी ठहरा सकती है, 26/11 को आरएसएस की साजिश बता सकती है, भगवा आतंकवाद का नैरेटिव बना सकती है, तो और क्या नहीं कर सकती !!!
सवाल है कि कांग्रेस के भीतर ऐसा मुस्लिम प्रेम आया कहाँ से, जो धीरे-धीरे हिंदू- घृणा से अपना पोषण प्राप्त करने लगा?? आजादी के आंदोलन से लेकर देखा जाए तो समझ आता है कि जिन्ना तो घोषित इस्लामिस्ट थे, इसलिए पाकिस्तान की बुनियाद में हिंदू घृणा के बीज थे, लेकिन ‘रामराज्य’ की बात करने वाले, बुद्ध और महावीर के दिखाए ‘अहिंसा’ के मार्ग पर चलने की शिक्षा देने वाले महात्मा गांधी और समाजवाद के झंडाबरदार नेहरू के रहते कांग्रेस मुस्लिम परस्त कैसे हो गई और कालांतर में भी होती गई? यह सवाल महत्वपूर्ण है…
इसका जवाब यह है कि पाकिस्तान को तो केवल एक ‘जिन्ना’ मिले, लेकिन भारत के हिस्से में एक के बाद एक बीसियों ‘जिन्ना’ आए, जिन्होंने हिंदू-मुस्लिम राजनीति का सहारा लेकर न केवल कुर्सी हथियाई, बल्कि इस दौरान तुष्टीकरण की नीतियों से समाज को खोखला भी करते रहे। राजनीति के समीकरण सेट करने के चक्कर में, वोटों की खेती के लिए वे समानता की बात करने वाले संविधान की आत्मा को कुचलते गए। कानून की सबसे बड़ी किताब से राम दरबार का चित्र गायब कर दिया गया और आपातकाल के अंधेरे में उसमें सेकुलर और सोशलिस्ट जैसे विवादित शब्द बिना किसी बहस-मुबाहिसे के जोड़ दिए गए… सेकुलर सरकार मंदिरों का चढ़ावा हड़पकर हज के लिए सब्सिडी मुहैया कराने लगी… एक वर्ग को खुश करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया गया…
सेकुलरिज्म की तरह सोशलिज्म भी ऊपर से देखने में सांप्रदायिक नहीं दिखता, लेकिन हथियार तो उन्हीं हाथों का है, जो इस देश पर इस्लामी हुकूमत चाहते हैं….
… तो सेकुलरिज्म और सोशलिज्म के नाम पर हुए संविधान के ‘खतने’ के बाद की भारतीय राजनीति पर नजर डालिए तो समझ आएगा कि मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण और जाति के नाम पर हिंदू वोटों के बंटवारे का उद्देश्य सिर्फ 5-10 साल के लिए सत्ता में आना नहीं था, बल्कि भारत को वापस उस युग में ले जाना था, जहाँ वह छोटी छोटी रियासतों में बंटा कमजोर भू-प्रदेश हुआ करता था… जिस पर कब्जा करना और राज करना होता था…
इस जहरीली राजनीति का मकसद था- सबके मुंह सत्ता का खून लगा दो… फिर वो सत्ता के लिए आजीवन आपस में लड़ते रहेंगे… जरूरत हुई तो अपने धर्म और समाज के विरुद्ध जाकर दूसरे की गुलामी भी स्वीकार करेंगे, लेकिन देश को कमजोर करना नहीं छोड़ेंगे…
सोशलिज्म के नाम पर विकसित हुई हिंदुओं के भीतर ‘हिंदू घृणा’ ने तथाकथित सेकुलर ब्रिगेड का काम आसान कर दिया।
समय बीतने के साथ मुस्लिम प्रेम के इजहार की पहली शर्त बन गया – हिंदुओं से घृणा का सार्वजनिक प्रकटीकरण। धीरे-धीरे हिंदू धर्म-संस्कृति का अनादर मुस्लिम वोट की गारंटी बनने लगा… और कालांतर में, हिंदू समाज में विभाजन की राजनीति से वोट की यह गारंटी सत्ता की गारंटी बन गया… यह फार्मूला कई सालों तक कांग्रेस का सत्ता हासिल करने का सफल हथकंडा बना रहा… और आज भी कुछ राज्यों में कांग्रेस या उसकी सखी-सहेली पार्टियां इसी फार्मूले के जरिए राज कर रही हैं…
कांग्रेस ने मुस्लिम प्रेम दिखाने के लिए एक तरफ तो ‘हिंदुओं में फूट डालो’ की नीति अपनाई… तो दूसरी तरफ उसने मुसलमान वोटों को तरह- तरह से लामबंद और एकजुट किया। हिंदुओं के बाद सबसे बड़ी आबादी होने के बावजूद अल्पसंख्यक का दर्जा और उस बहाने तमाम सुविधाएं देकर लुभाया गया। कांग्रेस ने मुसलमानों के वोट हासिल करने के लिए कई नियमों- कानूनों का भी ”खतना” किया, जिससे उनका वास्तविक स्वरूप और चरित्र बदल गया। बहुसंख्यक समाज को हाशिये पर डाल कर मुसलमानों को पहले दर्जे और हिंदुओं को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की भरसक कोशिश की गई….
आइए, जानते हैं, कांग्रेस ने कैसे भारत को एक मुस्लिम राष्ट्र बना दिया था
– 1950 में शरिया कानून लाया
– संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार धर्मांतरण को वैध बनाया। (हिन्दू और सिख नहीं कराते धर्मान्तरण। मुस्लिम और ईसाई कराते हैं).
– अनुच्छेद 28 के अनुसार हिन्दू अपने शिक्षा संस्थानों में धार्मिक शिक्षा नहीं दे सकते।
– अनुच्छेद 30 के अनुसार मुस्लिम और ईसाई अपने स्कूलों में मज़हबी शिक्षा दे सकते हैं।
– 1951 में मंदिरों के चढ़ावे का पैसा छीन लिया।
– बहु विवाह की छूट, जिससे मुसलमान जनसंख्या बढ़ा सकें।
– 1954 में बहु विवाह पर रोक परन्तु पर्सनल लॉ में कोई रोक नहीं।
– स्पेशल मैरेज एक्ट बनाया। (मुस्लिम लड़के हिन्दू लड़कियों से शादी कर सकें). फिल्मों और साहित्यकारों के माध्यम से इसे बढ़ावा दिया।
– 1975 में आपातकाल के दौरान संविधान में सेक्युलिरिजम शब्द जोड़ा।
– 1991 में सोनिया गाँधी के दबाव में अल्पसंख्यक आयोग बना। जबकि हिन्दुओं के लिए पहले से ही सेक्युलर शब्द अलॉट था।
– 1992 में पूजा स्थल अधिनियम बनाया। 40,000 मंदिरों पर कब्ज़ा कर लिया।
– 1995 में वक्फ कानून बनाकर मुसलमानों को ये अधिकार दे दिया कि वे जब चाहें हिन्दुओं की संपत्ति पर कब्ज़ा कर सकते हैं। हिन्दुओं को कोर्ट में अपील का अधिकार तक नहीं दिया।
– 9 दिसम्बर 2006 को मनमोहन सिंह ने घोषणा की कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ मुसलमानों का है। इतना ही नहीं एक साल बाद मनमोहन सिंह ने अपने उसी बयान को दोहराया कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ मुसलमानों का है।
– 2007- कांग्रेस का हलफनामा- राम एक काल्पनिक चरित्र हैं। रामसेतु तोड़ दें।
– 2013 में सोनिया गांधी ने कम्युनल वायलेंस बिल लाया। इसमें प्रावधान था कि कहीं भी दंगा होने पर स्वाभाविक रूप से हिन्दुओं को दोषी मना जाएगा। भाजपा के भारी विरोध के बाद क़ानून अमल में नहीं आ पाया।
– 2024 में गुजरात के चुनावी घोषणा पत्र में वादा किया कि कांग्रेस हिन्दुओं का धन लेकर मुस्लिमों में वितरण करेगी।
… तो ये कुछ पन्ने हैं अतीत के, जो गवाही देते हैं कि किस तरह कांग्रेस ने सेकुलरिज्म की आड़ में मुस्लिम तुष्टिकरण का खेल खेला, जो अब हिंदू घृणा में तब्दील हो गया है… लेकिन विडम्बना देखिये कि वोटों और सत्ता के लिए पतन की पराकाष्ठा तक जाने के बाद भी कांग्रेस मुस्लिमों की फेवरिट लिस्ट में क्षेत्रीय नेताओं से पीछे है। वे भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस को तभी वोट देते हैं, जब ममता, लालू, अखिलेश, केजरीवाल, ओवैसी जैसा कोई विकल्प न हो। अब कांग्रेस की मजबूरी है कि वह अपने झंडे को हरे रंग में इतना सराबोर कर ले कि उसे लोग मुस्लिम लीग मान कर वोट देने लग जाएं।
खैर, कांग्रेस और उसके जैसी मुस्लिम परस्त पार्टियों से सतर्क रहने की जरूरत पूरे हिंदू समाज को है। ऐसी जागरूकता के चलते, विधर्मियों के द्वारा भारत को मुस्लिम राष्ट्र बनाने की कोशिशें अधूरी रह गईं। मगर आने वाले समय में, देश के कोने-कोने में फलस्तीन बनाने का इनका मंसूबा पूरा नहीं होने पाए, इसका ध्यान रखना भी भारत प्रेमियों के लिए बहुत जरूरी है।
