इटली की कंपनी प्राडा ने महाराष्ट्र के कोल्हापुरी चप्पलों से प्रेरित लिमिटेड-एडिशन फुटवियर की एक नई रेंज लॉन्च करने की घोषणा की है। बता दें कि इटली में एक जोड़ी चप्पल की कीमत करीब 939 डॉलर (लगभग 85,000 रुपये) होगी।
बता दें कि जून में प्राडा उस समय विवादों में घिर गया था जब उसने ऐसी चप्पलें पेश कीं जिनका खुली उंगलियों वाला और चोटीदार पैटर्न वाला डिज़ाइन पारंपरिक कोल्हापुरी चप्पलों से काफी मिलता-जुलता था। प्राडा ने इन चप्पलों को “लेदर फ़ुटवियर” बताया था लेकिन यह नहीं बताया कि उनका मूल भारत में है। इससे भारत में नाराज़गी व्यक्त की गई और सांस्कृतिक अपहरण के आरोप लगे। बाद में प्राडा ने यह मान लिया कि इस डिज़ाइन की जड़ें भारत में हैं। इस बयान के बाद प्राडा की एक टीम ने कोल्हापुर का दौरा किया।
अब यह इटैलियन लग्ज़री ब्रांड (प्राडा) महाराष्ट्र और कर्नाटक में 2,000 जोड़ी चप्पलें बनाएगा। यह कलेक्शन फ़रवरी 2026 में ऑनलाइन और दुनिया भर में प्राडा के 40 स्टोर्स में बिक्री के लिए उपलब्ध होगा। इस समझौते पर गुरुवार को इटली-इंडिया बिज़नेस फ़ोरम 2025 के दौरान हस्ताक्षर किए गए।
शुक्रवार को महाराष्ट्र के सामाजिक न्याय मंत्री संजय शिरसाट ने मीडिया को बताया कि इस नई पहल का नाम होगा ‘Prada Made in India – Inspired by Kolhapuri Chappals. उन्होंने कहा, “प्राडा की ज़रूरतों और मांग को ध्यान में रखते हुए, कुछ कारीगरों को प्राडा और लिडकॉम (लिडकॉम- महाराष्ट्र में लेदर इंडस्ट्री को सपोर्ट करने वाली सरकारी संस्था) से विशेष प्रशिक्षण दिलवाया जाएगा। इसके अलावा, लगभग 200 कोल्हापुरी चप्पल कारीगरों को इटली में तीन साल का प्रशिक्षण दिया जाएगा।
कोल्हापुरी चप्पल का इतिहास
इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता कि ये चप्पलें कोल्हापुर में कब और कहां से आईं। हालांकि, 13वीं शताब्दी के आसपास कोल्हापुरी जूते और चप्पलों से जुड़े कुछ संदर्भ ज़रूर मिलते हैं। चालुक्य वंश के शासनकाल से ही कर्नाटक-महाराष्ट्र की सीमा से लगे इलाक़ों में इन चप्पलों का इस्तेमाल होने लगा था। उस समय ये चप्पलें अलग-अलग गांवों के नाम से पहचानी जाती थीं, जैसे कापशी, अथनी, क्योंकि इन्हीं गांवों के कारीगर इन्हें बनाते थे। लेकिन इतिहासकार इंद्रजीत सावंत बताते हैं कि शाहू महाराज के शासनकाल में इन चप्पलों को ‘कोल्हापुरी चप्पल’ के रूप में ख़ास पहचान मिली। उनका कहना है कि शाहू महाराज ख़ुद ये चप्पलें पहनते थे, ताकि इन्हें सम्मानजनक दर्जा मिल सके।
उन्होंने बताया कि महाराजा ने कोल्हापुर शहर के जवाहरनगर और सुभाषनगर में इस व्यवसाय को बढ़ावा देने की व्यवस्था की। चमड़े के कारीगरों को ज़मीनें दी गई और चमड़ा ख़रीदने की भी उनके लिए विशेष व्यवस्था की गई। इसके बाद इन चप्पलों का नाम कोल्हापुर से जुड़ गया और यह शहर की पहचान बन गई।
