BMC चुनाव में हार गयीं ‘डैडी’ की दोनों बेटियां

 

गैंगस्टर से नेता बने अरुण गवली उर्फ़ डैडी की दोनों बेटियां- गीता गवली और योगिता गवली- बृहन्मुंबई महानगर पालिका (BMC) चुनाव में अपने-अपने वार्डों से चुनाव हार गई हैं। यह हार न सिर्फ गवली परिवार के लिए, बल्कि उनकी पार्टी अखिल भारतीय सेना (अभासे) के लिए भी बड़ा राजनीतिक झटका है।

डैडी की बड़ी बेटी गीता गवली पहले तीन बार BMC पार्षद रह चुकी हैं। वह वार्ड नंबर 212 भायखला-आग्रीपाड़ा क्षेत्र से चुनाव लड़ रही थीं। गीता गवली को 6,823 वोट मिले। उन्हें समाजवादी पार्टी (SP) की उम्मीदवार अमरीन शहजान अब्राहनी ने हराया।

छोटी बेटी योगिता गवली ने यह अपना पहला चुनाव लड़ा था। वे वार्ड नंबर 207 भायखला-चिंचपोकली क्षेत्र से मैदान में थीं। योगिता गवली को 6,377 वोट मिले। उन्हें भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उम्मीदवार रोहिदास लोखंडे ने शिकस्त दी।

चुनाव से पहले गीता और योगिता ने मीडिया से बातचीत में कहा था कि लोग उन्हें डॉन की बेटियां नहीं, बल्कि “डैडी की बेटियां” मानते हैं। उनका दावा था कि दगड़ी चॉल के लोग उनके पिता को भरोसे और उम्मीद की नजर से देखते हैं और उन्होंने कई समस्याओं का समाधान किया है। गीता ने कहा कि पापा तो रॉबिन हुड हैं। उन्होंने काम किया है, पूरे देश में उनका नाम है। अच्छे काम किए हैं, इसलिए नाम है। उन्होंने कहा था कि हमने काम किया है, इसलिए हमारे अंदर काफी आत्मविश्वास है। हम लोगों के साथ परिवार की तरह जुड़े हुए हैं।

1980 के दशक में अरुण गवली को शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे का राजनीतिक संरक्षण मिला, लेकिन 1990 के दशक के मध्य में दोनों के बीच मतभेद हो गए। इसके बाद गवली ने अभासे पार्टी बनाई और 2004 से 2009 तक चिंचपोकली विधानसभा से विधायक रहे। 2008 में एक शिवसेना पार्षद कमलाकर जामसांडेकर की हत्या के मामले में उन्हें जेल भेजा गया था। करीब 17 साल जेल में बंद रहने के बाद सितंबर 2025 में उन्हें जमानत पर रिहा किया गया। अरुण गवली के समर्थक उन्हें प्यार से ‘डैडी’ कहते हैं। वो जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे थे, लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद वे नागपुर जेल से बाहर आए हैं। उन्होंने अपनी पार्टी अभासे के टिकट पर अपनी बेटियों को चुनाव मैदान में उतारा था।

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