देवनाथ सिंह उर्फ़ देवा सेठ
एक गुमनाम लेकिन सच्चा समाजसेवक वह व्यक्ति है जो प्रसिद्धि, पद या पुरस्कार की लालसा के बिना, निःस्वार्थ भाव से समाज के दबे-कुचले, निर्बल और वंचित वर्गों के कल्याण के लिए कार्य करता है। ऐसा समाजसेवी अपने व्यक्तिगत जीवन में साधारण होता है लेकिन समाज सेवा के प्रति समर्पण में असाधारण होता है। आधुनिक समय का गुमनाम समाजसेवी ज़मीनी स्तर पर काम करता है। ऐसे समाजसेवक में ऐसी खूबियां होनी चाहिए जैसे- 1-जिस समुदाय की सेवा कर रहा है, उसकी आवश्यकताओं और समस्याओं को सही तरीके से समझे। 2- लोगों की गरिमा का सम्मान करे और उनकी भावनाओं और संवेदनाओं को समझे और 3- संवेदनशील मुद्दों के प्रति सजग रहे और संवेदनशीलता के साथ काम करे। ऐसे बहुत से गुमनाम नायकों और उनकी कहानियाँ इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह गयीं। महाराष्ट्र के ठाणे जिले के कल्याण में रहनेवाले एक व्यक्तित्व देवनाथ सिंह उर्फ़ देवा सेठ भी एक गुमनाम लेकिन सच्चे समाजसेवक हैं। गीता का कथन कि- क्या लेकर आये थे क्या लेकर जाओगे को देवा सेठ ने आत्मसात कर लिया है। फर्श से अर्श पर पहुंचने वाले देवा सेठ अब फर्श पर बैठकर समाजसेवा कर रहे हैं।
बिहार की मिट्टी से जुड़े 48 वर्षीय देवनाथ सिंह, जिन्हें लोग प्यार से ‘देवा सेठ’ के नाम से जानते हैं, आज महाराष्ट्र के कल्याण पूर्व क्षेत्र में एक मिसाल बन चुके हैं। साल 1991 में बिहार के आरा जिले के रुद्रनगर गांव से रोज़गार की तलाश में महाराष्ट्र आए देवा सेठ ने मेहनत और लगन के बल पर पहले नौकरी की, फिर ठेकेदारी में कदम रखा और आज भवन निर्माण के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई।
देवा सेठ मीडिया की चकाचौंध से दूर रहकर चुपचाप समाजसेवा करते हैं। वे गरीबों, जरूरतमंदों और वंचित वर्ग के लोगों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। मुफ्त चिकित्सा शिविर, माता का जागरण, छात्रों को मुफ्त किताब-कॉपी वितरण, बेरोजगार को रोजगार देना, किसी परिवार को संकट से उबारना हो, वे बिना किसी प्रचार के मदद करते हैं। देवा सेठ भगवान भोलेनाथ के भक्त हैं। इन्होंने भगवान शिव का एक मंदिर भिवंडी के कोनगांव और दूसरा अपने पैतृक गांव में बनवाया है। देवा सेठ की इच्छा कुल पांच मंदिर बनवाने की है।
देवा सेठ एक निडर समाजसेवी भी हैं। किसी गंभीर मुद्दे पर वे कभी-कभी सरकार से सवाल भी कर लेते हैं। सरकार से सवाल का हल भी पूछते हैं। लेकिन वह सवाल (आवाज़) अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के उन लोगों के लिए होता है जो अपनी बात नहीं रख पाते। देवा सेठ जैसे लोग यह साबित करते हैं कि सच्ची समाजसेवा दिखावे से नहीं, बल्कि निस्वार्थ भाव और कर्म से होती है।
देवा सेठ की सरकार और प्रशासन से लेटेस्ट मांग और सुझाव
1- बाबासाहब भीमराव आंबेडकर जयंती (14 अप्रैल) के उपलक्ष्य में देवा सेठ ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से मांग की है कि देश में बाबासाहब आंबेडकर का एक भव्य स्मारक बनाएं। ऐसा स्मारक बनाएं जो एक प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो। इससे न केवल बाबासाहब के विचारों का व्यापक प्रसार होगा बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी उनसे प्रेरणा लेने का अवसर मिलेगा। बाबासाहब आंबेडकर ने देश को संविधान दिया और कानून व्यवस्था की मजबूत नींव रखी, जो आज भी देश को एकजुट और संगठित बनाए हुए है।
2- कल्याण लोकसभा क्षेत्र के सांसद डॉ. श्रीकांत शिंदे निःसंदेह अपने लोकसभा क्षेत्र में विकास कार्य कर रहे हैं। लेकिन देवा सेठ का कहना है कि कल्याण पूर्व में एक भी गार्डन ठीक स्थिति में नहीं है, जिससे बच्चों और बुजुर्गों को सुबह-शाम शुद्ध हवा में बैठने, टहलने और ओपन जिम जैसी सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। क्षेत्र में गार्डन की कमी नहीं है, लेकिन उनका रख रखाव सही तरीके से नहीं हो रहा है। कई जगह गार्डन बदहाल स्थिति में हैं और जहां गार्डन के लिए जगह आरक्षित है, वहां भी विकास नहीं किया गया है। इतना ही नहीं, कुछ स्थानों पर इन आरक्षित जगहों पर अतिक्रमण होने की भी शिकायत है। सांसद डॉ. श्रीकांत शिंदे इस मुद्दे पर भी ध्यान दें।
3- पत्रकार, जिन्हें लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, आज खुद कई बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे हैं। दिन भर शहर की समस्याएं, विकास कार्य, जनता की आवाज और प्रशासन की कमियों व उनके द्वारा किए गए कामों को सामने लाने में उनका पूरा समय निकल जाता है। वे समाज और सरकार के बीच एक मजबूत कड़ी का काम करते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि जो दूसरों की आवाज उठाते हैं, उनकी अपनी समस्याएं अक्सर अनसुनी रह जाती हैं। आज भी कई पत्रकार ऐसे हैं जिनके पास रहने के लिए खुद का घर तक नहीं है, क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं होती कि वे अपना घर खरीद सकें। फील्ड में लगातार काम, अनियमित आय और सुरक्षा की कमी के बीच वे अपना जीवन गुजारते हैं। ऐसे में राज्य सरकार को उनकी स्थिति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और आवास योजना, बीमा व स्थिर आय जैसी सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए। इसके साथ ही पत्रकारों को ऐसे वैकल्पिक कार्य या योजनाओं से जोड़ा जाए, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय का स्रोत मिल सके। इससे वे आर्थिक रूप से सशक्त बनेंगे और बिना किसी दबाव के निष्पक्ष और बेहतर पत्रकारिता कर पाएंगे।
