इस बार ऑर्डर ऑर्डर नहीं, कठघरे में खुद योर ऑनर…!

 

अकेला

दिल्ली हाई कोर्ट के ‘माननीय न्यायाधीश’ जस्टिस यशवंत वर्मा के घर ‘नोटों की होली’ क्या जली, पूरे देश में कथित न्यायपालिका की कथित सत्यनिष्ठा पर आम जनता के कथित भरोसे के फिर से एक बार तार-तार होने की झंकार बीट जोर-जोर से चहुंओर बजने लगी! ईमानदारी के सूचकांक में नीचे से नंबर वन बनने के लिए प्रतिस्पर्धा करने वाले वर्ग से आने वाले (चाहे वो नेता हों, सरकारी बाबू हों, पुलिस वाले हों या पत्रकार वगैरह) लोग भी इस भ्रष्टाचार की भर्त्सना करने को लेकर होड़ करने लगे… संसद से लेकर सड़क तक और टीवी से लेकर ट्विटर तक मातमपुर्सी का आलम देख कर लग रहा था, जैसे ईमानदारी नाम की चिड़िया कोई पहली बार भ्रष्टाचार नाम की गुलेल के आगे खेत रही हो! लोगों को हैरान देख कर हैरानी हो रही थी…

जिस देश के लोगों ने पिछले कुछ दशकों में पीएम से लेकर प्यून तक और जल-थल-नभ व पाताल तक समस्त सजीव एवं निर्जीव मंडलों में व्याप्त भ्रष्टाचार के सारे आयाम देख लिये हों, वे अगर एक जज के घर में 15 करोड़ कैश की बात पर हैरान होते हों, तो फिर दोष उनकी स्मृति का है, जो ‘पब्लिक की शॉर्ट मेमोरी’ के नाम से विख्यात है। ऐसे लोग अभी हाल ही में सेवा से बर्खास्त हुए यूपी के एक आला अफसर को दो ही दिन में भूल गए, जो पद पर रहते करोड़ों की संपत्ति बनाने का आरोपी है। जज साहब के ‘मेहनत से बटोरे’ नोटों के अधजले बंडलों को देख कर आंखें फाड़ रहे लोग लगता है, मध्य प्रदेश के उस आरटीओ कर्मचारी को भूल गए, जिसकी कमाई के आगे सिलिकॉन वैली के अच्छे-अच्छे कमाऊ पूतों की कमाई फीकी पड़ जाए! फिर भी लोगों को अगर हैरान होने में मजा आ रहा है, तो चलिए, इस मजे के बहाने इस मजेदार विषय यानी न्यायपालिका की कार्य प्रणाली (पढ़ें- निर्णय पालिका की मनमानी) पर कुछ चर्चा हो जाए….

पहली बात तो यह है कि न्यायपालिका को निर्णय पालिका कहना ज्यादा उचित है, क्योंकि अदालतों में न्याय का काम बहुत पहले बंद हो चुका है और वहां अब केवल निर्णय यानी फैसला देने का काम होता है। और जहां तक कार्य प्रणाली की बात है, तो माननीय मिलॉर्ड साहबों के ‘हरि अनंत, हरि कथा अनंता’ की तर्ज पर इतने कारनामे और इतनी करतूतें सामने आ चुकी हैं कि उनके आचरण और व्यवहार को (व्यक्तिगत और संस्थागत) मनमानी कहना गलत नहीं होगा!! यहां एक डिस्क्लेमर जोड़ते चलें कि इस आलेख में विशुद्ध रूप से भ्रष्टाचार और कदाचार में शामिल उन कतिपय लोगों की चर्चा की गई है, जिनके कारण पूरे तंत्र पर सवालिया निशान लग जाते हैं और जो अपने आचरण से बेचारे ईमानदार, निष्ठावान और कर्तव्य परायण लोगों को शर्मिंदा करते हैं…. अस्तु!

…. तो जो खबरें मीडिया में आ रही हैं, उनके मुताबिक, जस्टिस वर्मा भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस (रिटायर्ड) डीवाई चंद्रचूड़ के अत्यंत कृपापात्र रहे हैं. जस्टिस चंद्रचूड़ ही थे, जिन्होंने पिछले साल यानी अक्टूबर 2024 में न्याय की देवी की प्रतिमा को एक नया रूप और नया अर्थ प्रदान करने की ‘पहल’ की थी. न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी को उन्होंने उतार दिया और उसके हाथ में तलवार की जगह ‘संविधान’ को पकड़ा दिया। इस तरह जाते-जाते वे न्याय की देवी की वह प्रतिमा सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के दफ्तर में स्थापित कर गए, जिसकी शायद वो कल्पना करते बड़े हुए होंगे या जो छवि उन्होंने अपने दिल-दिमाग में बना रखी होगी…

लेकिन इस प्रतिमा को अपने दिल- दिमाग से बाहर लाकर सुप्रीम कोर्ट के अंदर स्थापित करने से पहले उन्होंने आम जनता तो छोड़िए, उस बार एसोसिएशन की राय जानना भी जरूरी नहीं समझा, जिसके दफ्तर में वह प्रतिमा स्थापित की गई है। संविधान को सर्वोपरि बताने के प्रयास में वे ‘आम राय’ जैसा लोकतंत्र का बुनियादी तकाजा भूल गए, जिससे लगा कि कहीं न कहीं वे शायद ‘जज की राय सर्वोपरि’ का सिद्धांत प्रतिपादित करना चाह रहे थे। खैर, न्याय की देवी का रूप बदलने की कोशिश में उन्होंने जाने-अनजाने न्याय की परिभाषा बदलने की कोशिश की, ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा।

न्याय की देवी के पुराने रूप में उनकी आंखों पर बंधी पट्टी न्याय के अंधे होने का नहीं, बल्कि इस बात का प्रतीक है कि उसकी निगाह में छोटे-बड़े, अमीर-गरीब का कोई फर्क नहीं है, वह इस आधार पर कोई भेदभाव नहीं करती, उसकी नजर में सब बराबर हैं और वह पैसा- पॉवर कुछ नहीं देखती. जबकि तलवार उस दंड का प्रतीक है, जो न्याय के बुनियादी सिद्धांतों में से एक है… दंड के भय के बिना कानून के राज की कल्पना करना असंभव है। हालांकि यह भी सच है कि जस्टिस बिरादरी पिछले लंबे अरसे से दंड के भय को समाप्त करने में लगी है। दंड का भय खत्म होना कानून का भय खत्म होने के बराबर है, जिसका असर आज हमें देश में हर तरफ देखना पड़ रहा है। इसके लिए जस्टिस चंद्रचूड़ जैसे जज जिम्मेदार हैं, जिन्होंने बीते कई वर्षों से अपनी सोच को ‘जज की राय सर्वोपरि’ मानकर देश पर कानूनी फैसलों की आड़ में थोपा है।

जिस तरह जस्टिस चंद्रचूड़ ने न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी हटा कर और हाथ में तलवार की जगह संविधान पकड़ा कर पूरे देश पर अपनी तथाकथित आधुनिक सोच अलोकतांत्रिक तरीके से थोप दी, उसी तरह विगत वर्षों में कई जजों ने अपनी निजी सोच, निजी समझ को अपनी संवैधानिक स्थिति का फायदा उठाते हुए जनमानस पर थोपा है! इस पर इस देश में ‘अवमानना’ यानी कंटेम्प्ट के डर से पर्याप्त चर्चा नहीं हुई है।

यह जज बिरादरी का विशिष्टता बोध ही है, जो उनके अंदर आम आदमी तो छोड़िए, संसद में बैठे कानून बनाने वाले लॉ मेकर्स को भी अपने आगे तुच्छ समझने का अहंकार जगाता है, जो उन्हें कानून की मनमानी व्याख्या करना सिखाता है, जो उन्हें खुद को पूरे तंत्र से ऊपर समझने का भ्रम देता है, जो उन्हें किसी भी उत्तरदायित्व से परे करता है… और अंततः इस व्यवस्था में राजा-महाराजा से भी ऊपर ईश्वर के परम पद पर विराजित करता है, जहां से उसे समस्त सृष्टि को कठघरे में खड़ा करते हुए प्रवचन देने का स्वयंसिद्ध और प्रकृति प्रदत्त अधिकार हासिल है…! इस बात का विचार किए बिना कि उसकी कही बात कितनी न्यायसंगत और तर्कसंगत है!!

किसी विषय पर रनिंग कमेंटरी के रूप में उसकी ‘आकाशवाणी’ जब एक जागरूक नागरिक के कानों में पड़ती है, तो वह कानून का विद्यार्थी भले ही न हो, लेकिन इंसाफ का तक़ाज़ा उसे सवाल करने पर मजबूर कर देता है कि एक समुदाय विशेष के आरोपी और जघन्य अपराध के दोषी करार दिए गए व्यक्ति के लिए सुप्रीम अदालत आधी रात को खुल सकती है, तो एक पार्टी विशेष को वोट न देने वाले लोगों को चुनाव के बाद चुन-चुन कर निशाना बनाए जाते वक्त माननीय जज साहब छुट्टियों का हवाला देते हुए अंतर्ध्यान क्यों हो जाते हैं?? नूपुर शर्मा के बहुचर्चित मामले में एक जज साहब तो ज्ञान की अविरल गंगा नि:संकोच बहा देते हैं (मौखिक रूप से, लिखित से कतरा जाते हैं), लेकिन उसी जुडीशरी के दूसरे आधार स्तंभ अन्य जज जुबैर के मामले में किसी धारा प्रवाह लेक्चर से परहेज करते नजर आते हैं…

ऐसे अनेकों उदाहरण हैं, जहां जज साहब का पक्षपात और पूर्वाग्रह ही नहीं, उनकी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद तक साफ नजर आती है। किसी खास पार्टी, किसी खास एनजीओ, किसी खास वकील, किसी खास विचारधारा, किसी खास मकसद, किसी खास एजेंडे से जुड़े मामले को अदालतों में बेवजह तरजीह मिलना यह बताता है कि जिसे आम जनता पंच परमेश्वर या न्याय के देवता का दरबार समझती है, वह दरअसल राजनीति और सत्ता की लड़ाई का एक अखाड़ा है। यहां फैसला (न्याय नहीं!) देने से ज्यादा प्रवीणता फैसले को लटकाए रखने में साबित करनी पड़ती है!! महाराष्ट्र के सत्ता-संघर्ष से जुड़ा मामला इसका सटीक उदाहरण है। एक पार्टी के विभाजन के बाद उस पार्टी का कौन-सा गुट मूल और वैध है तथा एक नाटकीय घटनाक्रम के बाद अस्तित्व में आई सरकार वैध है या नहीं, इस पर फैसला लेना न्यायिक प्रवीणता का उदाहरण है या फैसला लटकाना, यह आप स्वयं समझ सकते हैं!! और अब तो इस मामले में कोई फैसला आ भी जाए, तो वह कितना प्रासंगिक होगा? क्योंकि समीक्षाधीन सरकार और विधायकों का कार्यकाल तो पूरा हो चुका… वहां नई सरकार बन चुकी है।

पक्षपात और पूर्वाग्रह, उदासीनता (मामलों को लटकाए रखना) के बाद बात आती है सुपीरियॉरिटी यानी सर्वोच्चता की… इनका यानी अधिकांश जजों का मानना है कि ये कानून पालिका नहीं, बल्कि स्वयं/ अपने आप में/ खुद ही कानून हैं… ये कानून बना नहीं सकते… कानून बनाने का काम संसद का है, लेकिन ये किसी खास कानून की खास (पढ़ें- मनमानी) व्याख्या करके उसे पहले एक नजीर और फिर धीरे-धीरे अलिखित कानून के रूप में स्थापित कर देते हैं। जैसे – ‘बेल इज रूल एंड जेल इज एक्सेप्शन’ इनकी अपनी व्याख्या है, जिसके तईं फैसला करते समय ये पता नहीं, क्या ‘जज’ करते हैं और फिर खड़े-खड़े बेल या फिर जेल का ऑर्डर पास कर देते हैं… अर्णब गोस्वामी, पवन खेड़ा, तीस्ता सीतलवाड़, मनीष कश्यप, आसाराम बापू से लेकर सोनिया गांधी, राहुल गांधी से लेकर… लिस्ट लंबी हो सकती है…!!

जज साहेबान में भी कुछ तो नेताओं जैसे मौसम वैज्ञानिक होते हैं… अभी हाल ही में एक जज साहब मुफ्त की रेवड़ियों पर उखड़ गए… धाराप्रवाह प्रवचन दिया… कहने लगे… लोगों को निकम्मा और काहिल बना रही सरकार… मुफ्त की रेवड़ियों से कितने नुकसान हैं, सब बता दिए… लेकिन इसमें सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि मुफ्त की रेवड़ियों को लेकर इन जज साहब के ज्ञान चक्षु तब खुले, जब आम आदमी पार्टी दिल्ली का चुनाव हार गई और उसके ही मुफ्त की रेवड़ियों वाले फॉर्मूले को अपना कर भाजपा पहले महाराष्ट्र और फिर दिल्ली में भी चुनाव जीत गई… ऐसे में अगर जजों के व्यक्ति आधारित, विचारधारा आधारित पसंद- नापसंद जाहिर करने वाले फैसलों पर कोई उंगली उठाए, तो क्या उस पर विचार नहीं होना चाहिए??

किसान आंदोलन की आड़ में अराजक तत्वों को प्रश्रय और बॉर्डर पर सड़क जाम से दिल्ली वासियों को होने वाली तकलीफ से निजात दिलाना, इन दोनों में से सुप्रीम कोर्ट को किसे चुनना चाहिए था और उसने किसे चुना, यह सबने देखा… क्या इसके बाद भी यह समझना बाकी है कि जज साहब की आंखों पर किस विचारधारा की पट्टी बंधी है??

संविधान और लोकतंत्र की दुहाई देकर ईवीएम पर सवाल उठाने वाली फिजूल की पॉलिटिकली मोटिवेटेड और एजेंडाबाज, धंधेबाज वकीलों के द्वारा दायर याचिकाओं पर हर दूसरे- तीसरे महीने सरकार को नोटिस जारी करने वाले जज साहब को चुनाव सुधार के असली मुद्दों में कोई दिलचस्पी क्यों नहीं है? क्यों वे इस बात का स्वत: संज्ञान नहीं लेते कि चुनाव पूर्व गठबंधन कर वोट लेने और जीतने वाली पार्टियां चुनाव बाद अगर वह गठबंधन तोड़ दें और फिर ऐसी पार्टियां चुनाव बाद सरकार बनाने के लिए आपस में गठबंधन कर लें, जिन्होंने एक- दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा था, तो ऐसा गठबंधन न केवल अनैतिक और अपवित्र है, बल्कि मतदाताओं से घोर विश्वासघात भी है!! आखिर नैतिकता जैसे उच्च मूल्यों व आदर्शो का अदालत से बड़ा (स्वयंभू) प्रहरी इस धरा पर कौन है?!?!

समझना मुश्किल नहीं है कि अगर ऐसे जेनुइन मुद्दे पर जज साहब की अंतरात्मा जागृत नहीं होती (जो कि किसी दुर्दांत अपराधी की मौत की सजा को रद्द करते वक्त हो जाती है, इस संतवाणी के साथ कि ‘एवरी सिनर हैज अ फ्यूचर…’) तो उसकी मंशा राजनीति की गंगा साफ करने की हो ही नहीं सकती, बातें वह चाहे जितनी बड़ी-बड़ी करे!!

सलमान खान को खड़े-खड़े बेल देने वाले जज साहब जब आसाराम को बेल देने से बार-बार इंकार करते हैं तो सवाल उठना लाजिमी है… अदालत में दोषसिद्धि दोनों के मामले में हुई… इसके बाद जमानत अथवा पैरोल पाना दोनों का अधिकार है… लेकिन सलमान खान और संजय दत्त के लिए न्याय की इबारत अलग स्याही से लिखी जाती है और आसाराम के लिए अलग स्याही से!!

जज साहेबान ने एक और अलिखित कानून बना दिया है। जघन्यतम अपराधों के लिए संसद ने मृत्यु दंड दिए जाने का कानून बना रखा है। जनता द्वारा चुने हुए जन प्रतिनिधि बहुमत से कानून पास करते हैं लेकिन पांच या सात या नौ जज एक पीठ बना कर पूरे देश पर अपनी ‘ईश्वरीय’ राय थोप देते हैं कि मृत्यु दंड के लिए मामला ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ यानी ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ होना चाहिए… (1995 का नैना साहनी मर्डर केस अपने समय का जघन्यतम हत्याकांड था, लेकिन मात्र 18 साल बाद सुप्रीम कोर्ट की नजर में इस तरह का हत्याकांड ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ की परिभाषा से बाहर हो गया और 2013 में उसने दोषी की सजा को उम्र कैद में तब्दील कर दिया। और अगर पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब को फांसी देने का जन दबाव नहीं होता, तो माननीयों के द्वारा उसकी मौत की सजा को भी उम्र कैद में तब्दील करने में इस ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ पेंच के चलते देर नहीं लगती…)

यानी कानून बनाने का अधिकार भले ही विधायिका के पास हो, उसकी मनमानी व्याख्या का अधिकार हमें और सिर्फ हमें यानी जुडीशरी में बैठे चंद लोगों को है, जो न तो जनता द्वारा निर्वाचित हैं और न ही जनता के प्रति उत्तरदायी! आप उन पर सवाल नहीं कर सकते… अवमानना के जुर्म में वह कभी भी आपको जेल भेज सकते हैं… दूसरों को मर्यादा बताते हैं, लेकिन उनकी अपनी कोई मर्यादा नहीं है… अर्जेंट हियरिंग की दरख्वास्त मानें, न मानें, उनकी मर्जी, लेकिन राष्ट्रपति के सचिव को आदेश देने के लिए अपनी मर्यादा पार कर सकते हैं!! मूड हुआ तो स्वत: संज्ञान ले लेंगे, नहीं तो पीआईएल भी नहीं सुनेंगे… जुर्माना ठोंक देंगे, वो अलग!! लोकसेवक के नाते अपनी संपत्ति का ब्यौरा नहीं देंगे, लेकिन निर्वाचन आयोग को हुक्म देकर चुनाव के वक्त नेता जी की पूरी कुंडली भरवाएंगे फॉर्म में!! अपनी नियुक्ति खुद ही करेंगे, इसमें किसी का दखल बर्दाश्त नहीं, लेकिन चुनाव आयुक्त से लेकर सीबीआई चीफ तक की नियुक्ति में हस्तक्षेप को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानेंगे!!!

राजनीति से लेकर बॉलीवुड तक में भाई-भतीजावाद का मसला भले ही राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाए, लेकिन जुडीशरी में इसकी चर्चा लोग डर के मारे दबी जुबान ही करते हैं। कहीं न कहीं इसका अस्तित्व है और इससे जुडीशरी की साख पर बट्टा भी लग रहा है, नहीं तो ‘अंकल जज’ जैसा जुमला किस अर्थ में प्रयुक्त होता है? जज और वकील की सेटिंग अगर मिथ है, तो ‘बेंच हंटिंग’ जैसे जुमले किस बात के लिए प्रयोग होते हैं? इन सब चीजों से सिर्फ यह कहकर नहीं निपटा जा सकता कि साहब, इतना तो हर फील्ड में है… कुछ लोग हैं, जिनके कारण माहौल खराब है, सिस्टम बदनाम हो रहा है, सभी लोग करप्ट थोड़े ही हैं… माना कि सभी लोग करप्ट नहीं हैं… सही है कि समाज में सभी अपराधी नहीं हैं… लेकिन यह भी उतना ही सही है कि आम जनता तो पुलिस की वर्दी और लाठी से ही डर जाती है, तो क्या उसे बंदूक और असलहों की जरूरत नहीं है…? पुलिस को बंदूक और असलहे आम जनता को कंट्रोल करने के लिए नहीं, पेशेवर अपराधियों और उग्र व हिंसक अराजक तत्वों को कंट्रोल करने के लिए दिए जाते हैं। इसी तरह, कानून को भी नख-दंत अपराध को कंट्रोल करने के लिए दिए गए हैं। उच्च भ्रू वर्ग से आने वाले जज साहब अगर भारतीय सभ्यता और संस्कृति के बजाय पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के लिहाज से मैरिटल रेप यानी वैवाहिक बलात्कार की अवधारणा को स्थापित करना चाहेंगे, तो उसकी आवश्यकता और प्रासंगिकता पर सवाल उठेंगे ही… हिंदू पर्व-त्यौहारों से लेकर पूजा स्थलों के संबंध में अनावश्यक और अवांछित फैसले देने वाले जज साहब यदि दूसरे धर्मों की कुरीतियों पर चुप्पी साध लेंगे, तो सवाल उठेंगे ही… बहुविवाह को अप्राकृतिक और समलैंगिक संबंधों को मानवाधिकार बताने वाली मानसिकता से प्रेरित होकर यदि कोई जज फैसला देता है, तो सवाल उठेंगे ही…

… तो ऐसे जज साहेबान पर जितना लिखा जाए, उतना कम है! जस्टिस चंद्रचूड़ ने जब न्याय की देवी की आंखों पर से पट्टी हटाई होगी तो उन्होंने शायद सपने में भी नहीं सोचा होगा कि मात्र 6 महीनों के भीतर निर्णय पालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार के स्याह गलियारे पर पड़ा पर्दा एक झटके में हट जाएगा और कई लोग यूं बेनकाब हो जाएंगे! अब, जब न्याय की देवी की आंखें खुली हैं तो औरों की भी आंखें खुलने का वक्त आ गया है! मगर जगी आंखों को कानून के राज का सपना पूरा करने के लिए एक अदद किताब को ही नहीं, बल्कि दंड (तलवार) को भी मजबूती से थामना पड़ेगा, तभी राम-राज्य के लिए अनिवार्य ‘भय बिनु होय न प्रीत’ की कहावत चरितार्थ हो सकेगी!!

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