अमेरिकी उपन्यासकार एफ. स्काट फिट्जगेराल्ड का प्रसिद्ध कथन- “पहले आप शराब पीते हैं, फिर शराब आपको पीने लगती है और अंत में ये आपको पूरी तरह अपने कब्जे में ले लेती है- को उद्घृत करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक शराबी को मुआवजा देने से इन्कार कर दिया। जस्टिस जितेंद्र जैन की एकल पीठ ने बुधवार, 11 फरवरी 2026 को पारित आदेश में 2014 के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने मुआवजा देने से इन्कार कर दिया था।
आवेदक बॉम्बे हॉस्पिटल में लैब असिस्टेंट के तौर पर काम कर रहा था। उसने दावा किया था कि 10 मार्च 2001 की आधी रात वह मरीन लाइंस स्टेशन पर बोरिवली जाने के लिए लोकल ट्रेन का इंतजार कर रहा था, तभी एक आती हुई ट्रेन की चपेट में वह आ गया। उसे पहले GT हॉस्पिटल और बाद में बॉम्बे हॉस्पिटल ले जाया गया था। जहां अधिकारियों ने भर्ती होने के समय मरीजों की हिस्ट्री रिकॉर्ड करते हुए पाया कि आवेदक ने डिनर से पहले शराब के चार बड़े पैग लिए थे। रेलवे एक्ट 1989 के तहत मुआवजे के लिए आवेदक का दावा रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल ने खारिज कर दिया।
रेलवे एक्ट 1989 के सेक्शन 124-A में कहा गया है कि अगर पैसेंजर को नशे या पागलपन की हालत में किए गए किसी काम की वजह से चोट लगती है, तो रेलवे एडमिनिस्ट्रेशन कोई मुआवजा नहीं देगा। बॉम्बे हॉस्पिटल की मेडिकल रिपोर्ट में लिखा है कि एप्लीकेंट ने डिनर से पहले शराब के चार बड़े पैग पिए थे।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को राहत इसलिए नहीं मिल सकती क्योंकि चोट नशे की अवस्था में किए गए उसके अपने कृत्य के कारण हुई। हाई कोर्ट ने कहा कि इस घटना को ‘अनटुवर्ड इंसीडेंट यानी बदकिस्मती से हुई घटना’ नहीं माना जा सकता।
