राकेश मारिया
अकेला
परम्परा है। जब भी कोई व्यक्ति, किसी भी विषय पर, किसी भी भाषा में पुस्तक लिखता है तो उसके हितचिंतक, मित्र अथवा समीक्षक पुस्तक के बारे में अच्छा-अच्छा ही लिखते हैं। लेखक के बारे में भी कसीदे काढ़ डालते हैं। पुस्तक बिके या न बिके। कोई खरीदे या न खरीदे। फिल्म समीक्षकों का तो बाकायदा एक रैकेट है। उनका रेट फिक्स है। समीक्षक घटिया से घटिया फिल्म की समीक्षा बेहतर से बेहतर शब्दों में करते हैं। एक्टर की एक्टिंग और डायरेक्टर के डायरेक्शन के बारे में क्या-क्या लिख डालते हैं। फिल्म भले से रातों-रात सुपरफ्लॉप हो जाए। परन्तु राकेश मारिया इसके अपवाद हैं। राकेश मारिया मुंबई के क्राइम रिपोर्टर्स के माई-बाप हैं तो उनकी पुस्तकें अप्रतिम धरोहर हैं।
मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर (15 फरवरी 2014- 8 सितम्बर 2015) राकेश मारिया ने अपनी दूसरी पुस्तक ‘व्हेन इट ऑल बिगन’ (When It All Began: The untold stories of the underworld) का विमोचन कर दिया। 28 नवम्बर 2025 को जुहू के सोहो हाउस में इसका विमोचन हुआ। विमोचन समारोह में पूर्व पुलिस कमिश्नर रॉनी मेंडोसा, एम. एन. सिंह, डॉ. पी. एस. पसरीचा और बॉलीवुड से महेश भट्ट, नाना पाटकर, अजय देवगन, बोनी कपूर, रोहित शेट्टी, तब्बू आदि मौजूद थे। चूँकि राकेश मारिया का प्रोग्राम था सो उनके चेले-चापड़ बेस्ट डिटेक्टर्स पुलिस अधिकारी और क्राइम रिपोर्टर्स का रहना अवश्यम्भावी था। वे थे भी।
सोहो हाउस के उस रूम का दृश्य देखकर ऐसा लगा जैसे हम राकेश मारिया के दर पर आ गए हैं। सब चिर-परिचित चेहरे। राकेश मारिया का दर (जब वे ज्वाइंट कमिश्नर, क्राइम थे) शिर्डी के साईं बाबा का दरबार था, जहां से कोई याचक खाली हाथ वापस नहीं जाता था। शाम को न्यूज़ का अकाल पड़ने पर राकेश मारिया के दर पर चले जाने पर कुछ न कुछ मिल ही जाता था। कम से कम कोट (Quote) नहीं तो न्यूज़ की कन्फर्मेशन। राकेश मारिया क्राइम रिपोर्टर्स के संकटकालीन माई-बाप थे।
क्राइम ब्रांच में एडिशनल कमिश्नर की भी एक पोस्ट है। राकेश मारिया जब इस पोस्ट पर आये तो क्राइम रिपोर्टर्स को मालूम पड़ा कि ऐसी भी यहां कोई पोस्ट होती है। राकेश मारिया के वहां से हटने के बाद उस पोस्ट को लोग फिर भूल गए। राकेश मारिया रेलवे के पुलिस कमिश्नर थे। चोरी के सामानों की बरामदगी और यात्रियों को उसकी वापसी करवाने की परम्परा राकेश मारिया ने शुरू की। ऐसे ही एक फंक्शन में गृह मंत्री छगन भुजबल ने राकेश मारिया की स्तुतिगान करते हुए कहा था- मुझे आज मालूम पड़ा कि ऐसा भी होता है। मतलब चोरी गए सामानों को उनके मालिकों को वापस करना।
अपने-अपने समय में एम. एन. सिंह, डॉ. पी. एस. पसरीचा, डी. शिवानंदन, डॉ. सत्यपाल सिंह, परम बीर सिंह, हिमांशु रॉय आदि भी पत्रकारों के चहेते रहे हैं। इनके भी प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों की भीड़ लगती थी। लेकिन राकेश मारिया को इन सबसे जो बात अलग रखती है वह उनकी याददाश्त। राकेश मारिया देश के एकमात्र ऐसे अकेले आईपीएस हैं जिन्होंने कभी प्रेस नोट, नोट बुक या कागज पर लिखा मजमून पढ़कर मीडिया को ब्रीफ नहीं किया। आरोपियों के नाम उर्फ़ के साथ, गाड़ी का नंबर, घटनास्थल, तारीख, सेकंड के साथ टाइमिंग को धारा प्रवाह बता देते थे। उस दिन सोहो हाउस में भी उन्होंने वही किया। 50-60 साल पुरानी घटना को ऐसे नैरेट कर दिया जैसे अभी कल की ही बात हो। मुंबई पुलिस के सिपाही ह्रदय नारायण मिश्रा भी सबकी तरह किताब पर राकेश मारिया का ऑटोग्राफ लेने गए। वे पशोपेश में थे कि इतनी भीड़ में साहब मुझे पहचानते हैं कि नहीं। साहब यानि राकेश मारिया ने उनकी तरफ एक नज़र देखा और पुस्तक पर उनके नाम के साथ शुभकामनाएं लिख दीं। तब से ह्रदय नारायण मिश्रा प्रफुल्लित हैं।
राकेश मारिया इतने विलक्षण, बुद्धिमान और तेज़तर्रार अधिकारी रहे हैं कि टॉप कॉप, सुपर कॉप, इंटेलिजेंट, इंटेलिजेंस, इंटरोगेशन, विलक्षण याददाश्त जैसे विशेषण मानो उन्हीं के लिए जन्मे हों। ये विशेषण राकेश मारिया के पर्यायवाची शब्द हैं। उनकी असाधारण जांच क्षमता, तीक्ष्ण विश्लेषण शक्ति और दबाव की घड़ी में भी सटीक निर्णय लेने की योग्यता ने उन्हें भारतीय पुलिस सेवा का एक ऐसा प्रतीक बना दिया है, जिसकी मिसाल कम ही मिलती है। चाहे जटिल अपराध हों, हाई-प्रोफाइल केस हों या आतंकवाद से जुड़े संवेदनशील मामले—हर चुनौती के सामने उनका अनुभव, सम्मान और नेतृत्व एक अलग ही ऊँचाई पर दिखाई देता है।
राकेश मारिया खामगांव (अकोला) में थे, तब उन्होंने कथित तौर ‘थर्ड डिग्री’ पूछताछ से बचने की कोशिश की। मतलब मारपीट या दबाव के बजाय कानूनी तरीके व नैतिक पद्धति से पूछताछ करना पसंद किया। यह दिखाता है कि राकेश मारिया सिर्फ ‘तुरंत पकड़ लेने’ के बजाय ‘कानूनी और पक्का मामला’ बनाना चाहते थे, जो बाद में सबूतों व मुकदमेबाजी के लिहाज से बहुत मायने रखता है। मुंबई में 26/11 आतंकवादी हमले में पाकिस्तानी अजमल कसाब को ज़िंदा पकड़ने का ‘ऑर्डर’ राकेश मारिया का ही था।
राकेश मारिया महाराष्ट्र पुलिस के लिए ‘न भूतो न भविष्यति’ अधिकारी हैं।
राकेश मारिया की पहली पुस्तक (आत्मकथा) ‘लेट मी से इट नाऊ’ फरवरी 2020 में प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तक ने मुंबई में खलबली मचा दी थी। देश में भी चर्चा हुई थी। उस पुस्तक का एक वाक्या मुझे याद है कि राकेश मारिया ने पाकिस्तानी आतंकवादी मोहम्मद अजमल कसाब से दो बार ‘भारत माता की जय’ कहलवाया था। रोहित शेट्टी राकेश मारिया की बायोपिक बना रहे हैं। जॉन अब्राहम राकेश मारिया का किरदार निभा रहे हैं।
नयी पुस्तक ‘व्हेन इट ऑल बिगन’ अपराध, अपराधी और अपराध संवाददाताओं के लिए धरोहर है। इसे तिजोरी में सहेजकर रखना पड़ेगा।

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