IFS संजीव चतुर्वेदी केस में 16वें जज का सुनवाई से इन्कार, देश के न्यायिक इतिहास में रिकॉर्ड बन गया है यह केस

संजीव चतुर्वेदी

उत्तराखंड हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश, जस्टिस आलोक वर्मा ने IFS अधिकारी संजीव चतुर्वेदी द्वारा दायर अवमानना याचिका की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया है। इस प्रकार अब तक 16 जजों ने इस केस को सुनने से खुद को अलग कर लिया है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के दो जज, हाई कोर्ट के चार न्यायाधीश, एक कैट के अध्यक्ष, आठ कैट सदस्य व दो निचली अदालतों के न्यायाधीश शामिल हैं। यह याचिका केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के सदस्यों और रजिस्ट्री के खिलाफ जानबूझकर नैनीताल उच्च न्यायालय के स्थगन आदेश की अवहेलना करने के आरोप में दायर की गई थी।

यह मामला देश के न्यायिक इतिहास में रिकॉर्ड बन गया है, क्योंकि अब तक किसी एक व्यक्ति के मामलों से इतने अधिक न्यायाधीशों ने स्वयं को अलग नहीं किया था। अब तक संजीव चतुर्वेदी के मामलों की सुनवाई से कुल 16 न्यायाधीश स्वयं को अलग कर चुके हैं जिनमें दो सर्वेच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस यू.यू. ललित, चार उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, दो निचली अदालतों के न्यायाधीश, तथा केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के आठ सदस्य शामिल हैं, जिनमें एक कैट के अध्यक्ष भी रहे हैं।

सिर्फ 12 दिन पहले, नैनीताल उच्च न्यायालय के ही जस्टिस रवींद्र मैथानी ने भी चतुर्वेदी के एक मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग करते हुए आदेश दिया कि ‘इस प्रकरण को ऐसे अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए, जिसका मैं (रवींद्र मैथानी, न्यायाधीश) सदस्य न हूं।’ गौरतलब है कि इन चारों न्यायाधीशों में से किसी ने भी अपने रिक्यूजल आदेश में कोई कारण नहीं बताया है। जस्टिस आलोक वर्मा का अचानक सुनवाई से अलग होना विशेष रूप से उल्लेखनीय है, क्योंकि वे 29 अगस्त तक मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंड पीठ में चतुर्वेदी के मामलों की सुनवाई कर रहे थे।

फरवरी 2025 में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के दो सदस्य हरविंदर ओबेराय और बी. आनंद ने संजीव चतुर्वेदी के मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग किया था, जबकि अप्रैल 2025 में नैनीताल एसीजेएम नेहा कुशवाहा ने भी उनके मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया था। इनके अलावा, उत्तराखंड उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों द्वारा भी संजीव चतुर्वेदी के मामलों की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया गया है।

वर्ष 2021 में, उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने संजीव चतुर्वेदी के केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से संबंधित एक अन्य मामले में, जिसमें उन्होंने निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों की केंद्र सरकार में लेटरल एंट्री से जुड़ी अनियमितताओं को भी उजागर किया था, पर अपने पूर्व रुख को दोहराया। इस निर्णय को केंद्र सरकार ने पुनः सर्वेच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। मार्च 2023 में, सर्वेच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने इस मामले को एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया था।

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