आदरणीय मोदी जी
क्या आप नहीं जानते कि दिमागी नक्सलियों ने कैसे सुनियोजित तरीके से इस देश की शिक्षा व्यवस्था और प्रणाली पर ‘दिमाग’ से कब्जा किया… कैसे टीन एजर्स को सफाई से ब्रेन वॉश कर उसे अपनी राजनीति के टूल के रूप में इस्तेमाल किया और करते जा रहे हैं…
वर्ष 1989 में राजीव गांधी ने वोट देने की आयु पात्रता 21 से घटाकर 18 साल कर दी, तो उसके पीछे दिमागी नक्सलियों का कितना ‘हाथ’ था, क्या आप नहीं जानते…!
18 साल की उम्र के बच्चों को ब्रेन वॉश करना कितना मुश्किल है? कोमल मस्तिष्क और गरम खून वाली उम्र के बच्चों को ‘भगत सिंह’ बनने के लिए उकसाने वाले दिमागी नक्सलियों को क्या आप नहीं पहचानते?
एकेडीमिया पर चर्च और सिनेमा पर इस्लामियों के कब्जे से क्या आप अनजान हैं? बच्चों के दिमाग में सिनेमा (और अब सोशल मीडिया) के जरिए कचरा भरना और फिर ‘क्रांति’ के नाम पर उन्हें एक खास रास्ते पर धकेलने की रणनीति क्या आप नहीं देख पाते?
ये जो ‘जेन जी’ शब्द आज एक खास आयु वर्ग के बच्चों के लिए प्रयोग हो रहा है, वह क्या है? ये वही ‘क्रांति के कारखाने’ में काम करने वाले ‘मजदूर’ (बौद्धिक गुलाम) हैं और इन ‘कारखानों’ के मालिक वही दिमागी नक्सली हैं, जिन्हें पहचान कर उन्हें नेस्तनाबूद करने की अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ कर आप जनता से कह रहे हो कि तुम्हीं ‘कुछ’ करो…!!
… तो सवाल ये है कि इन सब चीजों को रोकने और खत्म करने के लिए आपने अब तक क्या किया? हमेशा बड़ी लकीर खींचना ही काफी नहीं होता… कई दफे अनचाही लकीरों को मिटा देना ज्यादा सही होता है…
‘हथियारबंद नक्सलियों’ के सफाए की तस्वीरें सबने देखी हैं… कई तो अविश्वसनीय लगती हैं… कफन में लिपटे ‘पाव-पाव किलो’ के आदिवासी/ग्रामीण बंदों को देख कर लगा नहीं कि वह राज्य के लिए कोई बड़ा थ्रेट रहा होगा… लेकिन वहां बड़ी लकीर खींचना आपको श्रेयस्कर नहीं लगा… मगर बॉलीवुड के भांडों से आपको हृदय परिवर्तन की बड़ी उम्मीद है… वहां आपको सफाई का मौका मिला था, लेकिन आपने सीबीआई के हाथ में झाड़ू देकर लीपा-पोती करना बेहतर समझा और लकीर लंबी करने में जुट गए… नेक्सस तोड़ने की कोई पंचवर्षीय योजना अगर थी भी तो परिणाम कुछ दिखा नहीं अब तक…!
इसी तरह नाबालिगों के ब्रेन वॉश का गुनाह करने वालों, उनसे नॉर्मल लाइफ छीनने वालों, अपने राजनीतिक फायदे के लिए उनमें जहर बोने वाले दिमागी नक्सलियों के खिलाफ आपने क्या कदम उठाए? जिस तरह तुष्टीकरण के लिए मास्टर स्ट्रोक पर मास्टर स्ट्रोक आपने पिछले 12 सालों में लगाए हैं, उसे देखते हुए आपसे यह उम्मीद तो नहीं है कि आप वोटिंग के लिए न्यूनतम आयु की सीमा 18 से बढ़ाकर 25 साल कर देंगे, लेकिन हाथ जोड़कर विनती है कि प्लीज, उसे घटाकर 15 साल मत कर देना …!!
दिमागी नक्सली कहने से सबका ध्यान सबसे पहले वामपंथियों की ओर जाता है, लेकिन इस कबाल में आपके भगवा दल के बहुरूपिये भी हैं, जो कहीं भाषा और क्षेत्र के नाम पर, तो कहीं पहनावे या वेज- नॉन वेज के नाम पर देश को तोड़ने में लगे हैं, लेकिन उसके लिए आपके पास कोई सोल्यूशन नहीं है… बस, हाइवे बनाओ, ब्रिज बनाओ… मेट्रो, एयरपोर्ट… विकास के नाम पर चल रही नक्शेबाजी पब्लिक समझ रही है… सब देख-जान रहे हैं कि आखिर विकास के ‘अमृत कलश’ के पीछे भाग रही नेताओं की भीड़ में अनगिनत राहु- केतु कहां-कहां से आकर शामिल हुए हैं…!
लॉंग टर्म के मुद्दों को नजरअंदाज करके शॉर्टकट वाली पॉलिटिक्स से आप दिमागी नक्सलियों को नहीं हरा पाएंगे… दिमागी नक्सली ‘दिमाग’ पर काबू करना चाहते हैं… उन्हें सिर्फ ‘अलग- थलग’ करने की छिछली अपील करने से समस्या का हल नहीं होगा…
जनता ने आपको चुना है ‘कुछ’ करने के लिए… और आप हैं कि सब कुछ जनता पर ही डाल दे रहे हैं कि तुम्हीं करो जो करना है… हम तो सिर्फ उपदेश देंगे…!!
X- We_Voice से साभार
