अंग्रेजों के तीन ये बन्दर थे – गांधी, नेहरू और जिन्ना, और … और कोई नहीं, ‘लाट साहब’ ही थे गांधी के ‘ईश्वर-अल्लाह’!!

 

अकेला

बिहार में 25 दिसंबर 2024 को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर आयोजित ‘मैं अटल रहूंगा’ कार्यक्रम में लोक गायिका देवी के ‘रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम… ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’ भजन गाने पर कुछ लोगों ने विरोध जताया। इस हंगामे के बाद देवी को बीच में ही भजन रोकना पड़ा और माफी मांगनी पड़ी। चूँकि भजन महात्मा गांधी के नाम पेटेंट है और इसमें ‘अल्लाह’ शब्द है तो हंगामा होना ज़रूरी हो जाता है. हंगामा हो रहा है. और होता रहेगा. ऐसे में मेरा भी मूड बन गया कि अंग्रेज़, गांधी, नेहरू और जिन्ना के बारे में दो शब्द लिखूँ. बिहार की लोकगायिका देवी विवाद के बहाने…

गांधी जी के तीन बंदरों की कहानी तो सबने सुनी होगी, लेकिन अंग्रेज बहादुर के तीन बंदरों की बदमाशियां कइयों को आज तक नहीं पता! पहली बात तो इन लोगों को यह तक नहीं पता कि अंग्रेज बहादुर के ये तीन बंदर थे कौन! अंग्रेज बहादुर ने वैसे तो कई सारे बंदर-भालू पाल रखे थे, जो अपने आका के इशारों पर काम करते थे, लेकिन ”गांधी- नेहरू- जिन्ना” नाम के इन खास तीन बंदरों ने अंग्रेज बहादुर को खुश करने के लिए जो कलाबाजियां दिखाईं, उसकी मिसाल दूसरी नहीं है। गांधी जी के तीनों बंदरों ने हमें सिखाया – बुरा मत देखो, बुरा मत बोलो, बुरा मत सुनो. जबकि अंग्रेज बहादुर ने अपने तीनों बंदरों को सिखाया – (ब्रिटिश राज का) बुरा मत सोचो… !

अब, ”गांधी- नेहरू- जिन्ना” नाम के इन तीनों बंदरों ने अपने ”गोरा साहब ” को खुश रखने के लिए क्या- क्या किया, वह सब इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। गांधी जी तो ब्रिटिश राज के इतने बड़े हमदर्द थे कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों की तरफ से लड़ने के लिए भारतीयों को भर्ती करने खुद ही गांव-गांव की खाक छानते फिरे। और तो और, जब दूसरे फ्रीडम फाइटर अंग्रेजों से पूर्ण स्वराज की मांग कर रहे थे, तब भी गांधी जी अंग्रेजों की छत्रछाया से भारत को दूर नहीं करना चाहते थे और एक डोमीनियन स्टेट बनकर रहने को राजी थे। अंग्रेजी हुकूमत की छाप उनके दिल- दिमाग पर इतनी गहरी थी कि वे बर्तानिया के ”यूनियन जैक” को भारत के राष्ट्र ध्वज तिरंगे पर भी थोपना चाहते थे…!

इसके बाद, अगर दूसरे बंदर यानी नेहरू जी की बात की जाए तो उनके विलायती ठाट-बाट ही यह बताने के लिए काफी हैं कि वे अंदर-बाहर से कितने भारतीय थे! खुद को ”एक्सीडेंटल हिंदू” कहने वाले नेहरू जी, पता नहीं क्यों, अपने को ”पंडित जी” कहलाना पसंद करते थे!! उन्होंने तो एक जगह खुद को भारत पर हुकूमत करने वाला आखिरी ”इंग्लिश मैन” तक कहा है। अब ब्रिटिश खजाने के ऐसे ”जवाहर” को आप अगर अंग्रेजों की सल्तनत का दुश्मन मानते हैं तो आप बेफिक्र होकर इन ”बंदरों” की पूंछ को अपनी मूंछ बताइये, हमें कोई आपत्ति नहीं !!

इसके बाद, अंग्रेज बहादुर के तीसरे बंदर हुए- जिन्ना साहब… ये गोरों के इतने अजीज थे कि पूरे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों ने इन्हें एक दिन के लिए भी जेल में नहीं डाला! हालांकि, गांधी- नेहरू कई बार जेल गए, लेकिन वो जेल (की सजा) उन्होंने ”हंसते-हंसते” काटी… जी हाँ, बिलकुल हंसते-हंसते, क्योंकि वहाँ उन्हें हर सुख-सुविधा हासिल थी। कोई कष्ट नहीं। इसके नाम, उसके नाम, लंबे-लंबे पत्र लिखो, किताबें लिखो, पढ़ो, नौकर-चाकर सब हाजिर! … तो अंग्रेजों ने अपने लाडले जिन्ना साहब को ऐसी नकली जेल में डालना भी मुनासिब नहीं समझा। अब इस जर्रानवाजी का शुक्रिया ”कायदे आजम” जिन्ना साहब ने अल्लाह के बजाय किंग के नाम का हलफ उठा कर अदा किया तो कैसी हैरानी! गांधी तो फिर भी धोती-लाठी लेकर “महात्मा” बन गए, लेकिन ”गोरा साहब से भी ज्यादा गोरा” दिखने को लेकर जिन्ना कभी नेहरू से पीछे नहीं रहे। उनकी सोच में शायद यही एक तरीका था, जिससे वो अपने को अंग्रेजों का सबसे बड़ा वफादार साबित कर सकते थे।

खैर, अंग्रेज बहादुर ने अपने इन तीनों बंदरों को एक-एक नुस्खा दिया, जिससे वो अवाम को बरगला सकें। उसने गांधी जी के हाथ में “चरखा”, नेहरू के हाथ में “जादुई कलम” (जिससे उन्होंने ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ नाम से मदरसा छाप इतिहास लिखा) और जिन्ना के “हाथ में लोटा, मुंह में पान” देकर साजिशन ऐसे मिशन पर लगा दिया, जिसकी परिणति देश के खूनी बंटवारे में हुई। दरअसल, इसे ‘बंदरबांट’ कहना ज्यादा सही होगा जो अंग्रेज बहादुर के इन बंदरों की “सम्मति” से हुआ था।

अंग्रेज बहादुर के ये तीनों बंदर कालांतर में बड़े ही मायावी निकले। भारतीयों को अंग्रेजों की तरफ से जंग लड़ने के लिए कहने वाले गांधी जी “अहिंसा के पुजारी” कहलाने लगे, “महात्मा” हुए, पहले कुछ लोगों के “बापू”, फिर पूरे देश के “राष्ट्र पिता” हो गए। नेहरू जी जैकेट में गुलाब खोंसकर “चाचा” बन गए और जिन्ना साहब “फादर आफ नेशन” बन गए।

ये सब हुआ अंग्रेज बहादुर की कृपा से। उन्होंने अपने इन बंदरों को टुकड़ों में बंटे भारत का भाग्य विधाता बना दिया। और अंग्रेज बहादुर के हाथ की सफाई देखिए कि अवाम को अपने साथ हुआ धोखा नजर भी नहीं आया! वह यही मानती रही कि साबरमती के एक संत ने बिना खड्ग, बिना ढाल, सिर्फ चरखे से देश को आजादी दिलाई थी। उसे आज भी लगता है कि नेहरू जी ने आधी रात को अंग्रेजी में भाषण करोड़ों हिंदुस्तानियों के लिए पढ़ा था। वह आज भी इस बात पर यकीन करती है कि विभाजन के लिए अकेले जिन्ना जिम्मेदार थे। इस वहमफहमी को सत्तालोलुप नेताओं ने अपने फायदे के लिए खूब बढ़ाया। दरबारी लेखकों- कवियों, इतिहासकारों ने जमकर स्याह- सफेद किया।

इस गोरखधंधे के चलते हुआ यह कि गांधी जी न केवल सेकुलरिज्म के मसीहा हो गए, बल्कि अपनी मायावी शख्सियत के चलते हिंदू- मुस्लिम एकता की मिसाल बन गए। हालांकि उनका हिंदू विरोध किसी से छिपा नहीं था। अब इसे उनकी मुस्लिम परस्ती कहें या कुछ और कि वे एक सनातनी देश में गाय की बजाय बकरी के दूध का प्रचार करते थे। उनके सेकुलरिज्म का आलम ये था कि वे अपना प्रिय भजन “ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम… ” किसी मस्जिद में नहीं गा पाए. उनका अहिंसा का सिद्धांत कहता था कि यदि मुसलमान हिंदुओं को मार भी डालना चाहें तो मुसलमानों के प्रति हिंदुओं को अपने मन में क्रोध नहीं लाना चाहिए और बहादुरी से मौत का सामना करना चाहिए। गांधी जी की देशभक्ति उन्हें मजबूर करती थी कि वो हिंदुओं से अब्दुल रशीद (स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे) को माफ कर देने की अपील करें, लेकिन वही देशभक्ति भगत सिंह की फांसी रुकवाने के लिए अंग्रेज बहादुर पर दबाव बनाने के लिए उन्हें मजबूर नहीं कर पाती थी…!

ऐसे ही एकतरफा सेकुलरिज्म के तथाकथित मसीहा गांधी जी के एक सेकुलर भजन को लेकर आजकल हंगामा मचा हुआ है। कहा जा रहा है कि “ईश्वर-अल्लाह” वाले इस भजन में गांधी जी ने मिलावट कर दी. (शायद इसीलिए भाजपा नेता अमित शाह ने उन्हें “चतुर बनिया” कहा था!) मूल भजन में अल्लाह कहीं नहीं लिखा लेकिन गांधी जी ने अपनी सेकुलर सनक के चलते इस भजन की पवित्रता भंग कर दी! बिहार में एक कार्यक्रम में पिछले दिनों बड़ा विवाद हुआ, लेकिन विवाद खड़ा करने से पहले अगर राष्ट्रवादी लोगों ने गांधी का चरित्र- परीक्षण किया होता तो उन्हें पता होता कि गांधी ने इस भजन में ईश्वर या अल्लाह या भगवान शब्द किसी परम सत्ता के लिए नहीं, बल्कि अपने “लाट साहब” अंग्रेज बहादुर के लिए प्रयोग किया था। अंग्रेज बहादुर ही उनके लिए ईश्वर, भगवान और गॉड सब कुछ थे। उसी से वे सम्मति के लिए प्रार्थना भी कर रहे थे। अंग्रेज बहादुर की कृपा से उनकी प्रार्थना फलीभूत हुई और उसके तीनों बंदरों को “बंदरबाँट” करने की “सम्मति” प्राप्त हुई जिससे अंततः देश टुकड़े-टुकड़े हो गया।

इसलिए जो (देश) भक्त गण भजन के विरूपण से आहत हैं, वे अंग्रेज बहादुर के इन मायावी बंदरों की बदमाशियों से जन-जन को अवगत कराएं। “महात्मा” और “पंडित” जैसे पवित्र संबोधन किस धर्म के अनुयायिओं को भ्रमित करने के लिए जोड़े गए? क्या इसलिए कि इनकी कही असत्य और अतार्किक बातों को भी बहुसंख्यक हिन्दू समाज एक गाइड लाइन के रूप में स्वीकार कर ले? मान ले कि गांधी का (एकतरफा) सेकुलरिज्म ही असली सेकुलरिज्म है! और नेहरू का समाजवाद ही असली समाजवाद है!! गांधी के सत्य के प्रयोगों को नजरअंदाज कर दे और उनके अतीत से दक्षिण अफ्रीका के पन्नों को निकाल कर उनका मूल्यांकन करे। नेहरू से जुड़े प्रसंगों को नजर का धोखा मान ले और नेता जी व सरदार पटेल के साथ हुई नाइंसाफी का ठीकरा भी आरएसएस के सिर फोड़ कर बगल हो जाए!

दरअसल, गांधी जी उतने ही “महात्मा” थे, जितने कि नेहरू “पंडित”!! इनकी खासियत यह रही कि ये बहुत उम्दा कलाकार रहे. अंग्रेज बहादुर ने इन्हें अपनी धुन पर नचाया। इन्होंने भी गजब करतब दिखाए। ऐसे कि देखने वाले देखते रह गए। लेकिन अब और विरूपण नहीं। न इतिहास का, न वर्तमान का और न ही भविष्य का। बंदर गुलाटियों के सच से लोग वाकिफ हो रहे हैं। ये बंदर अब और लोगों को उल्लू नहीं बना सकते।

कहते हैं- रामधुन के कई संस्करण हैं, और महात्मा गांधी ने जिस संस्करण का इस्तेमाल किया, उसमें ‘सार्वभौमिकता’ थी. महात्मा गांधी द्वारा मूल भजन को संशोधित करने के पीछे मंशा थी कि, हिंदुओं का ईश्वर और मुसलमानों का अल्लाह एक ही है। इस तरह यह उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एकजुट करने का प्रयास था। फिर यह सार्वभौमिक धुन किसी मस्जिद में क्यों नहीं बजता। फिर यह सार्वभौमिक धुन कोई मुसलमान क्यों नहीं गाता।

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