अकेला
समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी (यूनिफॉर्म सिविल कोड) को लेकर पूरे देश में मचे हो-हल्ले के बीच ताजा खबर यह है कि अब गुजरात सरकार ने भी राज्य में यूसीसी को लेकर एक समिति गठित कर दी है। इस पांच सदस्यीय समिति के माध्यम से कानून का मसौदा तैयार करने का जिम्मा सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज रंजना प्रकाश देसाई को सौंपा गया है। बता दें कि जस्टिस (रिटा.) देसाई ने ही उत्तराखंड में इस साल 27 जनवरी से लागू हुए समान नागरिक संहिता का प्रारूप तैयार किया था। उत्तराखंड इसे लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है।
यूसीसी को लेकर मुस्लिम समुदाय तो सदमे में है ही, उसको बरगलाने वाले और उसका “हमदर्द” बनकर उसके वोटों के सहारे अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले C. H. I. N. D. I. एलायंस में शामिल पार्टियां बुक्का फाड़कर रो रही हैं। हालांकि, जहां तक मुस्लिम समुदाय की बात है तो उसका समझदार तबका, जिसमें बडे़ पैमाने पर महिलाएं शामिल हैं, यूसीसी की अहमियत और जरूरत को जानता है, मानता है। उसे पता है कि रीति-रिवाज की रूढ़ियों से उपजी बुराइयों से निपटने के लिए जो पहलकदमी समाज के भीतर से होनी चाहिए, वह उनके यहां तो होने से रही। इसलिए ऐसी बुराइयों को खत्म करने के लिए अगर बाहर से (यानी सरकार या स्टेट की तरफ से) कोई पाबंदी कानून की शक्ल में सख्ती से लागू की जाती है, तो किसी को कोई गुरेज क्यों होना चाहिए! यह समझदार अवाम यह भी जानती है कि धर्म के ठेकेदार बिना सख्ती के इन बुराइयों से मुस्लिम समाज का पिंड छूटने भी नहीं देंगे। इसलिए यूसीसी के रूप में सरकारी सख्ती से इन्हें कोई ऐतराज नहीं। यह तबका यह भी जानता है कि तमाम इस्लामिक देशों में वे कानून कब का गर्क किए जा चुके हैं, जिनके लिए भारत का मुसलमान नाहक परेशान हुआ जा रहा है। (जहां तक हिंदू समाज की बात है, तो गनीमत है कि वहां समय के साथ-साथ समाज सुधार और धर्म सुधार के लिए आंदोलन हुए हैं और कुरीतियों से सौ फीसदी तो नहीं, लेकिन काफी हद तक छुटकारा मिला है। इसके अलावा, परिवार नियोजन को हिंदू समुदाय ने बिना किसी कानूनी सख्ती के अपनाया है, जो काबिले तारीफ है।)
मगर नेता हैं कि मानते नहीं!! वे मुस्लिमों को भड़काने में लगे हैं। कोई मुसलमानों पर अन्याय की दुहाई देते हुए यूसीसी के खिलाफ हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाने की धमकी दे रहा है, तो कोई इससे सिखों-ईसाइयों और आदिवासियों तक को खतरा बताते हुए अपनी दो टके की राजनीतिक छतरी के नीचे ज्यादा से ज्यादा विरोधियों को इकट्ठा करने की कोशिश में लगा हुआ है। हालांकि मकसद सबका एक ही है – मुसलमानों को मुख्य धारा में आने से रोकना। उसे एक ऐसे तबके के रूप में पेश करना, जो हर सुधारवादी कदम के खिलाफ है। जो कभी भारत के मूल विचार से सहमत नहीं हो सकता। जिसको अपनी ताकत का मुजाहिरा करने के लिए हमेशा एक अदद “ना” की जरूरत पड़ती है और जिसके लिए “हां” करना यानी किसी मसले को आपसी रजामंदी से सुलझा लेने की पेशकश मान लेना कमजोरी की निशानी है।
वैसे देखा जाए तो मुस्लिम समुदाय की ऐसी नकारात्मक छवि गढ़ने के लिए सिर्फ नेता ही जिम्मेदार नहीं हैं। ऊपर जिस समझदार तबके (यानी कथित अल्पसंख्यकों में भी अल्पसंख्यक) का जिक्र हुआ है, उसे अगर छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर मुसलमानों को समाज सुधार जैसी बातों से कोई लेना-देना नहीं है। उनको इस बारे में जानना-समझना तो दूर, चर्चा भी नहीं करनी कि बहु विवाह सही है या गलत, बाल विवाह सही है या गलत, तीन तलाक सही है या गलत… उनके लिए ये सब जायज है, क्योंकि यह धर्म है।
दरअसल यह नजरिया उनकी सोच का हिस्सा है, जो उनकी मजहबी तालीम से आता है। उनकी इस तालीम में सबसे ऊपर शरिया और पर्सनल लॉ है, जिसके आगे किसी संविधान का कोई महत्व नहीं है. ऐसी सोच रखने वाले लोगों को बरगलाना नेताओं के लिए आसान हो जाता है, जो जानते हैं कि कट्टरपंथियों के दिलो-दिमाग से कैसे खेला जा सकता है।
समुदाय विशेष के जन मानस को राजनीति विशेष के लिए तैयार करने और फिर उसे एक पार्टी विशेष के लिए इस्तेमाल करने का खेल समझना बहुत मुश्किल नहीं है। इसके पीछे बहुत सीधा-सा गणित है। वोट बैंक तैयार करने का गणित। इसमें सबसे पहले आता है तुष्टीकरण का फार्मूला। इसके लिए अकेले पार्टी विशेष यानी कांग्रेस को दोष देना ठीक नहीं होगा। उसे तो ये सब अंग्रेजों से विरासत में मिला। “फूट डालो और राज करो” का सिद्धांत तो कांग्रेस ने अंग्रेजों से सीखा। इतने सालों में वह इस कला में पारंगत हो गई है।
तो तुष्टीकरण की राजनीति के तहत पहला काम कांग्रेस की सरकारों ने यह किया कि अल्पसंख्यकों यानी मुस्लिम समुदाय की सभी जायज-नाजायज मांगों को हर कीमत पर पूरा करना। इसके लिए उसने वक्फ बोर्ड और पर्सनल ला जैसे वो सारे कानून बना दिए, जो मूल संविधान में थे ही नहीं। हज के लिए सरकारी सब्सिडी और राजकीय इफ्तार पार्टियां तो कांग्रेसी शासन काल की खूबसूरती रही हैं। वो तो कुछ संवैधानिक बाध्यताएं और सुप्रीम कोर्ट की अड़चन नहीं होती तो वह मुस्लिमों को धर्म के आधार पर आरक्षण देने से भी पीछे नहीं हटती। इस तुष्टीकरण के चलते हिंदू-मुस्लिम के बीच पहले से मौजूद खाई को और चौड़ा करने के लिए जो दूसरी फार्मूला अपनाया गया, वह था मजहबी तालीम का। आजादी के बाद मजहबी तालीम यानी धार्मिक शिक्षा के अधिकार से हिंदुओं को तो दूर कर दिया गया, क्योंकि इससे हिंदू समाज में एकता पैदा होती, जबकि मुस्लिमों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को धार्मिक शिक्षा का पूरा अधिकार दिया गया, ताकि उनमें धार्मिक एकता और ज्यादा मजबूत हो। इस तरह समाज में वैचारिक असंतुलन पैदा किया गया। मजहबी तालीम लेकर मुस्लिम और कट्टर होता गया, ईसाइयत और फैलती गई, अन्य धर्मावलंबी अपने-अपने धर्मों के समर्पित सिपाही बनते गए, लेकिन हिंदू समाज तथाकथित वैज्ञानिक और आधुनिक शिक्षा के जाल में फंस कर अपने ही धर्म,अपनी ही संस्कृति की खिल्ली उड़ाने लग गया। अपने ही देवी-देवताओं का मजाक बनाने लग गया। माथे पर तिलक-चंदन, सिर पर साफा-पगड़ी,पूजा-पाठ के पीछे का विज्ञान तलाश करने लगा और छद्म विज्ञान के चक्कर में नास्तिक से भी गया-गुजरा हो गया।
जिस भाषा में साइंस यानी विज्ञान के लिए कोई शब्द नहीं, उसके लोग मार्क्सवादियों के साथ मिलकर हिंदू आस्तिकों के ज्ञान-विज्ञान पर सवाल खड़े करने लगे। जिनके लिए धरती चपटी है, वे काल-गणना से सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण की भविष्यवाणी करने वाले सनातनियों को पोंगापंथी कहने लगे। विज्ञान के नाम पर अमेरिका की अपान-वायु को भी हींग की महक मानने वाले भद्रलोक वासी, हिंदू आस्तिक को यह कहकर कोसने लगे कि तुम भी कहां ढकोसला कर रहे हो… दुनिया चांद पर पहुंच गई। लेकिन ये तथाकथित अधपढ़ वैज्ञानिक अपने बौद्धिक पितामह अमेरिका से यह पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाए कि अंकल सैम, तमाम वैज्ञानिक प्रगति के बाद भी आप चांद पर दोबारा क्यों नहीं पहुंच सके?
खैर, यह तो हुई तथाकथित वैज्ञानिक, आधुनिक, प्रगतिशील आदि-आदि शिक्षा ग्रहण करने वाले और मुगलांडू वामपंथियों से बुद्धिजीवी होने का सर्टिफिकेट पाने की लालसा में अपने ही पूर्वजों को गरियाने वाले आम हिंदू की बात, जबकि मदरसे से निकले मुसलमान की बात करें तो वह भले ही डाॅक्टर – इंजीनियर बन जाए, वह अपनी धार्मिक पहचान को सीने से लगाए रखता है। उसकी मजहबी तालीम उसको आधुनिक बनने ही नहीं देती। अपवाद के तौर पर, कुछ लोग पहनावे- ओढ़ावे से आधुनिक हो भी जाएं तो सोच-विचार के लिहाज से वे अपने मूल विश्वासों से बंधे हुए ही मिलेंगे. जो ऐसे नहीं होंगे, उन्हें आप सही मायनों में अल्पसंख्यक कह सकते हैं….
तो यह मजहबी तालीम है, जो आम मुसलमान को उस तरह से सोचने से मना करती है, जिस तरह दूसरे तरक्कीपसंद व अमनपसंद लोग सोचते हैं। इनके लिए धार्मिक पहचान सिर्फ टोपी-दाढ़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि इनका पर्सनल लाॅ इनकी सबसे बड़ी धार्मिक पहचान है, जिसे वह किसी कीमत पर खोना नहीं चाहते. इस पहचान के लिए समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी एक बहुत बड़े खतरे के रूप में सामने आया है। इस कानून का मतलब है, पर्सनल लाॅ के तहत मिली बहुत-सी सहूलियतें खत्म, जो धर्म के ठेकेदारों को मंजूर नहीं है। धर्म के ये ठेकेदार उस धार्मिक शिक्षा केंद्रों यानी मदरसों के भी कर्ता-धर्ता हैं, जहां से तालीम हासिल कर, एक जैसी सोच वाली नस्लें पीढ़ी-दर-पीढ़ी बाहर आती हैं। साल-दर-साल दुनिया की तस्वीर बदलती है, नई-नई चीजें ईजाद होती हैं, नई सोच के साथ लोग सामने आते हैं, लेकिन मदरसों से निकले लोगों की सोच नहीं बदलती। अब ऐसे लोग बाकी दुनिया के साथ कदमताल कैसे मिलाएंगे? क्या समानता का सिद्धांत इनकी समझ में आएगा? क्या नागरिक होने के वही मायने इनकी डिक्शनरी में हैं, जो एक सनातनी के हैं? क्या कोई ऐसी संहिता इन्हें कबूल होगी, जो समानता और स्वतंत्रता जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करती हो?
ये सवाल बहुत अहम हैं। अहम इसलिए कि इनका जवाब ढूढ़े बिना समान नागरिक संहिता जैसे कानून बहुत फायदेमंद नहीं होंगे. किसी समाज की बुनियादी सोच को बदले बिना, ऊपर से कोई कानून थोप देना वैसा ही होगा, जैसा कि बदसूरती ढंकने के लिए क्रीम- पाउडर- लिपस्टिक का इस्तेमाल करना। ऐसा मेक-अप कब तक चलेगा? बदसूरती को खूबसूरती बताने वाले, कल को मौका मिलते ही यह मेक-अप उतार फेंकेंगे. इस काम में उनका साथ देंगे इनके हमदर्द नेता, जो आज इन्हें पूरी ताकत से इस कानून का विरोध करने के लिए उकसा रहे हैं। जबकि इसके लिए खुद सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को कई बार याद दिलाया है।
ऐसे में जरूरी है, भारतीय राजनीति का टेम्पलेट यानी पूरा खाका बदलना। इसके बिना भारतीय समाज में आमूल-चूल परिवर्तन संभव नहीं है। बहुलता में एकता और विभिन्नता में एकता जैसे जुमले सुनने में अच्छे लग सकते हैं, लेकिन विचारों की भिन्नता से किसी एकजुट समाज, एकजुट देश की कल्पना करना असंभव है… एक लक्ष्य को पाना तो महा-असंभव. रंग-बिरंगा होने की चाहत ने आज हमें जोकर बनाकर छोड़ दिया है। आज चीन की तरक्की और उसकी ताकत के पीछे कोई बहुलता में एकता का सिद्धांत नहीं है। वहां विचारों की भिन्नता के लिए कोई जगह नहीं है। भारत की तरह वहां दो-ढाई हजार राजनीतिक पार्टियां नहीं हैं, बल्कि एक पार्टी का निरंकुश शासन है। वहां विदेशी चंदे पर चलने वाले एनजीओ नहीं हैं। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर दुश्मन देशों का एजेंडा और नैरेटिव चलाने वाला मीडिया नहीं है। ये सब चाशनी और रायता उसके पिट्ठुओं ने सिर्फ भारत में फैला रखा है, जहां के लोग आज सौ साल बाद भी अंग्रेजों की राजनीति को नहीं समझ पाए। चीन की राजनीति को समझने में उन्हें शायद दो-चार सौ साल लग जाएंगे। भारत के अलावा अमेरिका और यूरोप में भी ऐसा ही रायता फैलाने में लेफ्ट-लिबरल गिरोह कामयाब हो गया। इसके चलते वहां क्या हालत है, यह किसी से छिपा नहीं है।
बहुलता में एकता जैसे चोंचले सांस्कृतिक छटा को बहुआयामी दिखाने तक के लिए ठीक है, लेकिन एक समाज, एक देश के रूप में एक लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए अगर वैचारिक समतल जमीन हमारे पास नहीं होगी, तो मेक-अप या लीपा-पोती वाले प्रयास नाकाफी ही साबित होंगे। कहने का जरूरत नहीं है कि यह वैचारिक समतल जमीन एक देश-एक कानून से पहले, एक देश-एक शिक्षा नीति लागू करने से ही हासिल हो सकती है। साथ ही, राजनीति और राजद्रोह के बीच फर्क करना भूल चुके नेताओं पर लगाम लगाए बिना समाज में समानता तो दूर, शांति की कल्पना करना भी मूर्खों के स्वर्ग में विचरण करने जैसा होगा! और अंत में सबसे महत्वपूर्ण बात… भारत में हिंदुओं के बाद सबसे बड़ी आबादी वाली कौम से अल्पसंख्यक का दर्जा वापस लिये बिना उन्हें कभी भी मुख्य धारा में नहीं लाया जा सकेगा।
