अकेला
उर्दू की मिठास ने आजकल सियासत का डायबिटीज खूब बढ़ा रखा है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में पिछले दिनों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और नेता विपक्ष माता प्रसाद पांडेय के बीच उर्दू भाषा को लेकर हुए संवाद के बाद से इस मामले को कुछ लोग विवाद का रूप देकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में लग गए हैं।
मेन स्ट्रीम मीडिया में तो कुछ चुनिंदा लोगों को ही विष-वमन का मौका मिल पाता है, लेकिन सोशल मीडिया पर हर आम- ओ- खास को यह आजादी हासिल है। इसलिए सोशल मीडिया पर उर्दू के लिए स्यापा करने वालों में एक- दूसरे को पीछे छोड़ने की जैसे होड़- सी लग गई।
योगी आदित्यनाथ की टिप्पणी से उत्पन्न विवाद के बाद सोशल मीडिया पर सामने आए उर्दू के तमाम पैरोकारों को पढ़कर जो समझ में आया, उसका लब्बो-लुआब यह है कि उर्दू बहुत मीठी जुबान है, तमीज और तहजीब की भाषा है, शायरी और इश्क की भाषा है, मुंशी प्रेम चंद, रामप्रसाद बिस्मिल से लेकर खुशवंत सिंह, गुलजार और न जाने किस- किस की भाषा है और यह भाषा चूंकि धरती से लेकर आसमान तक मोहब्बत से लबालब, जहीनतरीन लोगों की भाषा है, तो इसके बारे में बुरा बोलना- सुनना तो दूर, बुरा सोचना भी गुनाह है… और योगी आदित्यनाथ ने चूंकि उर्दू भाषा को कठमुल्लेपन से जोड़ा है, इसलिए वे और उनके समर्थक अनपढ़ और जाहिल हैं… वगैरह-वगैरह!
इन उर्दू प्रेमियों की और एक खास बात जो उनकी टीका-टिप्पणियों में दिखी, वो यह कि उर्दू से तो उन्हें बेपनाह मोहब्बत है, लेकिन दूसरी भाषाओं के प्रति सम्मान और प्यार वे कम ही जता पाते हैं। उसमें भी कोई अगर उनसे असहमत हो तो फिर प्यार-मोहब्बत सब भुला कर अपना असली “दिगंबर” रूप दिखाने में ये जरा भी देर व संकोच नहीं करते।
योगी आदित्यनाथ के मामले में भी ऐसा ही हुआ। सदन में हुए संवाद को गौर से देखें तो साफ दिखता है कि मुख्यमंत्री विपक्ष की टोका-टाकी से झुंझला कर नेता प्रतिपक्ष को उनकी तुष्टीकरण की नीति के लिए फटकार लगाते हुए उस विचार के विरोध में अपनी बात कह रहे हैं। उन्होंने उर्दू का विरोध नहीं किया बल्कि विपक्षी नेताओं के दोहरे रवैये को रेखांकित किया। अगर वे उर्दू भाषा के विरोधी होते तो अगले दिन सदन में शेरो-शायरी के जरिए अपनी बात नहीं रखते।
लेकिन नमाजवादियों को तो मुद्दा बनाना था। सो, लग गए सारे काम पर। उनके एजेंडे को सूट भी करता है यह मुद्दा। हिंदू-मुस्लिम में इन्हें भी खूब आनंद मिलता है। हालांकि आरोप ये भाजपा पर लगाते हैं लेकिन ‘यूनाइट दि माइनॉरिटी एंड डिवाइड दि मेजॉरिटी’ का सिद्धांत इनको खूब रास आता है। इनके लिए यह सत्ता हासिल करने का ‘ट्राइड एंड टेस्टेड’ फॉर्मूला है, जो हिंदू नव जागरण से पहले तक बहुत ही सफल रहा था। (हालांकि पिछले कुछ वर्षों से इसकी सफलता संदिग्ध हो गई है!)
तो, हिंदू-मुस्लिम राजनीति का एक हथियार भाषा भी है। इसलिए योगी आदित्यनाथ के एक मामूली ऑब्जेक्शन या प्रतिवाद को इस तरह तूल दे दिया गया, मानो उन्होंने कोई बहुत ही गलत बात कह दी हो! अब इन “उर्दूनशीं” नमाजवादियों का कठमुल्लापन इसी बात से साबित हो जाता है कि इन लोगों में से कोई भी महाकुंभ को लेकर हो रही ऊल-जुलूल टीका- टिप्पणियों का विरोध करने के लिए आगे नहीं आया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का विरोध ऐसे ही कठमुल्लेपन को लेकर था, है और रहेगा, रहना भी चाहिए… उर्दू ऐसे कठमुल्लेपन की जनक भले न हो, मगर उसके संवाहकों में से एक जरूर है। इस सच्चाई से मुंह मोड़ना भी कठमुल्लेपन से कम नहीं है!
ऐसे ही कुछ कठमुल्लों की पोस्ट्स देखने को मिलीं “एक्स” पर, जिनमें से सबसे ज्यादा मनोरंजक थी वह पोस्ट, जिसमें एक शायर साहब बड़े ही कमाल के अंदाज में (वाहवाही और तालियों के लिए बला की ओवर एक्टिंग करते हुए और इस तरह से हाथ नचाते हुए, मानो पार्ट टाइम कथकली डांसर हों!!) उर्दू पर एक शेर फरमाते नजर आ रहे हैं। नाम तो पता नहीं, चेहरे से भी नहीं पहचाना, लेकिन उनका द्विअर्थी शेर किस तमीज और तहजीब की मिसाल पेश करता है, वह आप खुद देख सकते हैं।
शेर इस तरह है-
हिंद की आन-बान है उर्दू
रौनके कुल जहान है उर्दू
(दो बार…)
(फिर हैरानी और गुस्सा दिखाते हुए सवालिया अंदाज में …)
क्या कहा? उर्दू गैर मुल्की है…!!
तेरी मां की…
(वाक्य को जान-बूझकर अधूरा छोड़ते हुए, ताकि द्विअर्थी बन जाए… क्योंकि सभी जानते हैं कि यह अधूरा वाक्य अपने आप में पूरी गाली के समान है…)
शायर साहब पहली लाइन दोबारा पढ़ते हुए…
क्या कहा?? उर्दू गैर मुल्की है…!!
तेरी मां की जुबान है उर्दू…
(और फिर वाह- वाह… वाह- वाह… का शोर)
… तो इस शेर और उसके अंदाज- ए- बयां से आप समझ ही गए होंगे कि किस तमीज- ओ- तहजीब की जुबान है उर्दू!! शायर साहब ने अगर “तेरी मां” की जगह “आपकी मां की” लफ्ज़ का इस्तेमाल किया होता तो शायद इस शेर ने लखनवी तहजीब की तो लाज रख ली होती!!!
इस शेर को कहने वाले ने, सुनकर वाह-वाह करने वालों ने और उर्दू की पैरवी में इसे पोस्ट करने वालों ने अपनी जहालत ही नहीं, बल्कि अपने कठमुल्लेपन का परिचय दिया है। भाषा का चमत्कार गाली में ढूंढ़ने वाले कठमुल्ले ही हो सकते हैं, सभ्य भाषा प्रेमी नहीं। कला और साहित्य के नाम पर जिस तरह फूहड़पन को स्वीकार नहीं किया जा सकता (भले ही उसका माध्यम कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो), उसी तरह कठमुल्लेपन का सिर्फ इसलिए स्वागत नहीं किया जा सकता कि वह उर्दू के घोड़े पर सवार होकर आया है।
बेशक, उर्दू एक लोकप्रिय भाषा है। लेकिन उर्दू की तरफदारी करने वाला एक नमाजवादी क्या यही बात उतनी ही श्रद्धा और प्रेम से संस्कृत के लिए भी कह सकता है? तमिल- तेलुगु, कन्नड़- मलयालम, ओड़िया- बंगाली, मराठी- गुजराती इत्यादि भाषाओं के लिए भी बिना किंतु- परंतु के यही बात कह सकता है?
संस्कृत से तो उसको जन्म- जन्मांतर से एलर्जी मालूम पडती है, क्योंकि उसके साथ “देव भाषा” का विशेषण जुड़ा हुआ है। और इनकी तालीम इन्हें देव से नफरत करना सिखाती है… देव भाषा होने के नाते संस्कृत स्वत: ही पंडितों की भाषा हो जाती है और इस नाते वह अत्याचारी कुलीन वर्ग की भाषा करार दे दी जाती है… और यह सब करने से पहले यह नहीं देखा जाता कि वह भाषा मीठी है कि नहीं, वह भारतीय है कि नहीं, उसका साहित्य कितना सम्रृद्ध है, उसका व्याकरण कितना संपन्न है, वह कितनी ही भाषाओं की जननी है… इन सबको नजरंदाज कर सिर्फ इस दुष्प्रचार को सिर-माथे उठा लिया गया कि यह पंडितों की भाषा है इसलिए इसे समाज से बहिष्कृत कर देना चाहिए….!!
इस तर्क से सोचें तो उर्दू किस वर्ग की भाषा है, उस पर भी विचार करना जरूरी है। आज उर्दू की तरफदारी करने वाले कह रहे हैं कि यह भाषा भारत में पैदा हुई। चलिए, इस बात को मान भी लें तो सवाल है कि क्या इस देश के मुसलमान अरब में पैदा होकर यहां आए हैं? वे भी तो भारत में पैदा हुए हैं। उनके बाप-दादा भी तो भारत में पैदा हुए। फिर वे क्यों खुद को भारतीय कहलाने में शर्म महसूस करते हैं? क्यों तैमूर, बाबर, लादेन, सद्दाम जैसे नाम से पहचाना जाना उन्हें मुगलिया खानदान का चश्मो-चिराग होने जैसा सुकून देता है? अरबी (विदेशी) लिपि और फारसी (विदेशी) के शब्दों को समेटे उर्दू को भारतीय साबित करने पर तुले बुद्धू-जीवी तब और भी हास्यास्पद हो जाते हैं, जब कुतर्क करते हुए कहते हैं कि बिरयानी तो इस देश में मुगल लाए थे, जबकि मुगलों को चावल भारत में नसीब हुआ!! हैरानी तो इस बात पर भी है कि जिस अरब वर्ल्ड में तेल की खोज के पहले एक ढंग की इमारत नहीं होती थी, वहां से आए लुटेरों को भारत में ताजमहल बनाने का श्रेय दिया जाता है!!
वाह रे मुगलाई प्रोपेगेंडा… संस्कृत तो पंडिताई और पोंगापंथी की भाषा, अंग्रेजी गुलामी की प्रतीक भाषा, भोजपुरी- अवधी जैसी स्थानीय बोली-भाषाएं पिछड़ेपन की भाषा, जबकि उर्दू तमीज और तहजीब की भाषा… संस्कृत भेदभाव, कटुता पैदा करने वाली अत्याचारी सवर्णों की भाषा, जबकि उर्दू प्यार और मोहब्बत की अमर निशानी “ताजमहल” के लिए हाथ कटाने वाले मजलूम कारीगरों की चाशनी में पगी भाषा… !!!
अब आपको भाषा के नाम पर एक खास वर्ग के तुष्टीकरण का वह खेल समझ में आ गया होगा, जो कमोबेश ऐसे ही तरीके से एक खास धर्म के नाम पर लोगों के साथ खेला जाता है। यह समुदाय विशेष एक समय में इस देश का सत्तारूढ़ वर्ग था। यानी इस मुल्क का मालिक। तब शासन- प्रशासन की भाषा फारसी हुआ करती थी। बाद में, अंग्रेजों के जमाने में भी कोर्ट- कचहरी की भाषा लंबे समय तक फारसी ही बनी रही। आज भी कुछ राज्यों में फारसी के बचे- खुचे वजूद के तौर पर एक खास वर्ग के तुष्टीकरण के लिए उर्दू को तीसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है।
तुष्टीकरण कहना इसलिए उचित लगता है कि जम्मू- कश्मीर में मात्र 0.16% आबादी के उर्दू भाषी होने के बावजूद उर्दू को वहां की राजभाषा बना दिया गया। कटरा एयरपोर्ट पर उर्दू में “श्री माता वैष्णो देवी” लिखा होना भी भाषाई सुप्रीमेसी चाहने वाले वर्ग के तुष्टीकरण का ही प्रतीक है। और भाषाई सुप्रीमेसी ही नहीं, बल्कि सदियों तक हुकूमत करने वाली सामंती सोच के लोग मौजूदा दौर के हुक्मरानों को ऐसे तुष्टीकरण के लिए मजबूर करते हैं। वरना क्या वजह हुई कि संस्कृत तो कुलीन वर्ग की भाषा का कलंक ढोने को मजबूर कर दी गई, जबकि फारसी- अरबी का अवशेष उर्दू आम आदमी की जुबान बन गई?? संस्कृत के श्लोक हिंदी फिल्मों में मजाक का विषय बन गए, जबकि उर्दू बॉलीवुड की राजभाषा बन गई!! किन लोगों ने किया ये सब?? किसकी कुत्सित मानसिकता ने किया ये सब? क्या अब भी इसके पीछे की राजनीति को समझने के लिए रॉकेट साइंस की डिग्री चाहिए?? एक धर्म विशेष, संस्कृति विशेष, भाषा विशेष को औरों से श्रेष्ठ बता कर उसके ही तुष्टीकरण में लगे रहना क्या सही मायने में किसी देश, किसी समाज का भला कर सकता है?
बिलकुल नहीं! इसलिए आपको समझना होगा कि विरोध उर्दू का नहीं, उस तुष्टीकरण का है, जो भाषा, संस्कृति और धर्म की आड़ में होता आया है। उर्दू होगी तमीज और तहजीब की भाषा, होगी प्यार- मोहब्बत की भाषा, लेकिन मीठी छुरी बनकर सनातन की जड़ों को काटने की कोशिश करेगी तो उसको अपने अंजाम तक पहुंचने में देर नहीं लगेगी।
उर्दू के भारतीय होने पर विवाद हो सकता है, लेकिन संस्कृत के भारतीय होने पर कोई विवाद नहीं है। उर्दू की मिठास अगर औरंगजेब का बखान करने वालों की भाषा के रूप में सामने आएगी, तो जवाब मराठी भाषा की तल्ख़ी से ही मिलेगा।
और अगर उर्दू ऐसे किसी बदनीयत नमाजवादी का ढाल बनकर खड़ी होती है, जो भारत को पाकिस्तान का उपनिवेश बनते देखना चाहता है, तो उसे अपनी सीमाएं जितनी जल्दी पता चल जाएं, उसके लिए उतना ही बेहतर होगा !!
खैर, यह तल्ख़ी उस उर्दू भाषा के लिए नहीं है, जो वाकई मोहब्बत की जुबान है… बल्कि उस उर्दू के लिए है, जो किसी भी सनातन विरोधी टूलकिट का हिस्सा है… जो किसी भी तरह से देश विरोधी विचारों की संवाहक है, दूसरी भाषाओं के दमन का औजार है, जो बॉलीवुड के लव जिहाद वायरस का कैरियर है और जो समाज को दोबारा मुगलकालीन अंधकार युग में ले जाने का सपना देखने वालों को दिमागी खुराक देने वाली भाषा बन गई है… इसलिए जब योगी कहते हैं कि उर्दू से कठमुल्लेपन का खतरा है, तो उनका इशारा भाषा के संभावित दुरूपयोग की तरफ ही था।
सच तो यह है कि भाषा विचारों के आदान- प्रदान का जरिया होती है। इंसान की तरक्की का माध्यम होती है। उसे बेड़ी की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। न तो अंग्रेजी से अंधी नफरत और न ही उर्दू से अंधी मोहब्बत किसी का कुछ भला कर सकती है। भाषा के नाम पर लड़ने के बजाय हमें यह समझना होगा कि भाषाएं ज्ञान हासिल करने का टूल हैं, न कि राजनीति का।
