पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने मासिक धर्म में बहू से करवाई भगवान गणेश की पूजा, मुंबई के वकील घनश्याम उपाध्याय ने भेजा लीगल नोटिस !!

डी. वाय. चंद्रचूड़ और घनश्याम उपाध्याय

तो गजबै होइ गवा। बॉम्बे हाई कोर्ट के प्रसिद्ध वकील घनश्याम उपाध्याय ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व जस्टिस डॉ. डी. वाय. चंद्रचूड़ को लीगल नोटिस भेजा है। डी. वाय. चंद्रचूड़ का गुनाह यह है कि उन्होंने अपनी रजस्वला बहू को भगवान गणेश की पूजा करने की अनुमति/सहमति दी। इस घटना का सार्वजनिक मंच पर ज़िक्र कर डी. वाय. चंद्रचूड़ ने दूसरा अपराध कर दिया। घनश्याम उपाध्याय ने डी. वाय. चंद्रचूड़ को सनातन विरोधी और भविष्य में केरलम के शबरीमाला मंदिर विवाद को प्रभावित करनेवाला मान लिया।

घनश्याम उपाध्याय ने 9 जून 2026 को डी. वाय. चंद्रचूड़ को लीगल नोटिस भेजा है। लीगल नोटिस की प्रति ABI (abinewz.com) के पास है।

लीगल नोटिस के अनुसार डी. वाय. चंद्रचूड़ ने 28 मई 2026 को Menstrual Hygiene Day के मौके पर एक सार्वजनिक मंच पर लोगों को बताया कि- जब मेरे बेटे की शादी हुई, तब हमारे घर में पहली बार गणपति उत्सव मनाया जा रहा था। ऐसे में मेरी बहू मेरे पास आई और उसने कहा- पापा, मुझे मासिक धर्म (पीरियड्स) चल रहे हैं। क्या मैं उस कमरे में जा सकती हूँ जहाँ गणपति स्थापित हैं और क्या मैं पूजा कर सकती हूँ?

मैंने उसकी ओर देखा और कहा- बेटा, किसी भी इंसान में कोई अशुद्धि नहीं होती। अशुद्धि मन की अवस्था होती है, शरीर की नहीं। इसलिए तुम्हारी मासिक धर्म की स्थिति चाहे जो भी हो, तुम्हें पूर्ण स्वतंत्रता है कि तुम आओ, बैठो और प्रार्थना करो। तुम इस घर के हर हिस्से का उपयोग कर सकती हो और पूजा में भाग ले सकती हो। और उसने ठीक वैसा ही किया।

डी. वाय. चंद्रचूड़ का यह वक्तव्य सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसे मुंबई के वकील घनश्याम उपाध्याय ने भी पढ़ा। घनश्याम उपाध्याय सनातन (हिंदू) धर्म के घोर अनुयायी, वेदों, आगमों, स्मृतियों तथा प्राचीन काल से चली आ रही पारंपरिक धार्मिक विधियों और अनुष्ठानों के प्रति गहरी श्रद्धा और सम्मान रखने वाले व्यक्तित्व हैं। डी. वाय. चंद्रचूड़ के इस वक्तव्य से घनश्याम उपाध्याय को मानसिक आघात लग गया।

डी. वाय. चंद्रचूड़ को सम्बोधित करते हुए घनश्याम उपाध्याय ने लीगल नोटिस में कहा है कि- सार्वजनिक मंच पर यह भाषण देकर आपने केवल अपने परिवार की निजी व्यवस्था का वर्णन नहीं किया, बल्कि जानबूझकर अपने व्यक्तिगत विचार को एक आधिकारिक सुधारवादी मानक के रूप में प्रस्तुत और प्रचारित किया, जो सीधे तौर पर सनातन धर्म के मूल शास्त्रीय नियमों को चुनौती देता है, उन्हें अवैध ठहराता है और वस्तुतः उनका उपहास करता है।

आपने लाखों दर्शकों से यह कहकर कि “शारीरिक अशुद्धता जैसी कोई चीज़ अस्तित्व में नहीं है”, जनता को सक्रिय रूप से गुमराह किया है और अपने न्यायिक पद की प्रतिष्ठा का उपयोग करते हुए शास्त्रों में दिए गए आदेशों को निष्प्रभावी करने का प्रयास किया है।

सनातन धर्म में स्त्री के मासिक धर्म के दौरान अपनाया जाने वाला अस्थायी पृथक्करण (रजस्वला व्रत) नैतिक पतन या सामाजिक बहिष्कार का संकेत नहीं है। यह शौच (अनुष्ठानिक पवित्रता) के सिद्धांतों द्वारा संचालित एक सुव्यवस्थित शारीरिक, ऊर्जात्मक और आध्यात्मिक व्यवस्था है। आपका यह कथन कि “शारीरिक अशुद्धि एक मिथक है”, वैदिक, स्मृति तथा आगमिक ग्रंथों में वर्णित सिद्धांतों का प्रत्यक्ष खंडन करता है।

आपने यह पूर्णतः अनावश्यक और अनुचित टिप्पणी न केवल महिलाओं के मासिक धर्म के दौरान लगाए गए प्रतिबंधों के पीछे के शास्त्रीय और वैज्ञानिक कारणों की जाँच-पड़ताल किए बिना की, बल्कि वास्तव में आपने यह अत्यंत गैर-जिम्मेदाराना बयान केवल सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के उद्देश्य से दिया। यह आपके पक्ष में आत्ममुग्धता (Narcissism), दिखावटी आचरण (Grandstanding) और जन-प्रसन्नता के लिए बयानबाज़ी (Pandering to the Gallery) से कम नहीं है।

इन परिस्थितियों में, मैं आपको यह नोटिस देता हूँ कि आप उसी अथवा समकक्ष डिजिटल एवं सार्वजनिक मंचों पर एक बिना शर्त सार्वजनिक क्षमा-याचना तथा स्पष्ट एवं निर्विवाद सार्वजनिक खंडन (रिट्रैक्शन) जारी करें। उसमें यह स्पष्ट रूप से उल्लेख करें कि आपकी टिप्पणियाँ केवल आपके निजी घरेलू प्रबंध तक सीमित थीं; कि आपको सनातन धर्म के शास्त्रों, स्मृतियों, पुराणों एवं आगमों की पुनर्व्याख्या करने, उनके प्रभाव को कम करने अथवा उन्हें निरस्त करने का कोई शास्त्रीय, धार्मिक या धर्माधिकारिक अधिकार प्राप्त नहीं है; तथा यह कि आपका उद्देश्य भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित सबरीमाला पुनर्विचार/संदर्भ कार्यवाही को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित करना नहीं था।

आपसे यह भी अपेक्षा की जाती है कि भविष्य में आप सार्वजनिक संगोष्ठियों, मीडिया मंचों, सोशल मीडिया के प्रसार माध्यमों अथवा अपने पूर्व संवैधानिक पद से जुड़ी प्रतिष्ठा का उपयोग सनातन धर्म के धार्मिक सिद्धांतों और अनुष्ठानिक अनुशासनों को नीचा दिखाने, तुच्छ साबित करने, उनकी पुनर्व्याख्या करने या उन्हें नए रूप में प्रस्तुत करने के लिए न करें, विशेषकर उन विषयों पर जो संवैधानिक न्यायालयों के समक्ष विचाराधीन हैं और जिनका धर्म, मंदिरों की स्वायत्तता, धार्मिक स्वतंत्रता तथा श्रद्धालुओं की भावनाओं पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।

घनश्याम उपाध्याय का यह भी मानना है कि डी. वाय. चंद्रचूड़ ने केरलम के सबरीमाला मंदिर विवाद को प्रभावित करने के लिए भी ऐसा बयान दिया है।

केरलम के पत्तनमिट्टा जिले में स्थित सबरीमाला मंदिर के मुख्य देवता, भगवान अयप्पा को ‘नैष्टिक ब्रह्मचारी’ (कठोर ब्रह्मचारी) माना जाता है । इसी मान्यता के आधार पर सदियों से 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित रहा है, क्योंकि इस उम्र को मासिक धर्म (menstruation) से जोड़कर देखा जाता है। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की पीठ इस विवाद की जटिलताओं पर सुनवाई कर रही है।

घनश्याम उपाध्याय ने लीगल नोटिस में मासिक धर्म का शास्त्रों और पुराणों में वर्णित उद्धरण संस्कृत में प्रस्तुत कर डी. वाय. चंद्रचूड़ को आइना दिखाया है।

घनश्याम उपाध्याय ने डी. वाय. चंद्रचूड़ को आगाह किया है कि यदि वे नोटिस की प्राप्ति के सात दिनों के भीतर निहित मांगों/निर्देशों का पालन करने में विफल रहते हैं, तो वे उनके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराओं 298, 299 एवं 353 तथा समय-समय पर संशोधित सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धाराओं के तहत FIR दर्ज कराएंगे।

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