पुरुषोत्तम चव्हाण
महाराष्ट्र प्रोटेक्शन ऑफ इंटरेस्ट ऑफ डिपॉजिटर्स (MPID) एक्ट की एक विशेष अदालत ने शुक्रवार को पुरुषोत्तम प्रभाकर चव्हाण को जमानत दे दी। उन पर आरोप है कि उन्होंने निवेशकों को सब्सिडी दरों पर कथित सरकारी कोटा के प्लॉट दिलाने का झांसा देकर ₹7.42 करोड़ रुपये की ठगी की। अदालत ने कहा कि जांच पूरी हो जाने के बाद, जब मुकदमे की सुनवाई अभी शुरू भी नहीं हुई है, तो लंबे समय तक हिरासत में रखना उचित नहीं है। पुरुषोत्तम चव्हाण IPS अधिकारी रश्मि करंदीकर के पति है।
अदालत ने कहा कि जून 2025 से हिरासत में रहे आरोपी को “अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता”, खासकर जब चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, सबूत पहले ही जब्त किए जा चुके हैं और मामला अभी प्रक्रियात्मक चरण में है।
यह मामला मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) द्वारा दर्ज FIR से जुड़ा है। FIR के अनुसार, एक IPS अधिकारी के पति पुरुषोत्तम चव्हाण ने अपने सहयोगियों और सरकारी अधिकारी बनकर पेश होने वाले लोगों के साथ मिलकर निवेशकों को कम कीमत पर सरकारी कोटा के प्लॉट दिलाने का लालच देकर साजिश रची। इनमें ठाणे के सब-रजिस्ट्रार कार्यालय से जुड़े होने का दावा करने वाले लोग भी शामिल थे।
FIR में कहा गया है कि पुरुषोत्तम चव्हाण और उनके साथियों ने पुणे और ठाणे की नगरपालिकाओं से जुड़े फर्जी डेवलपमेंट राइट्स सर्टिफिकेट (DRC) दिखाकर भरोसा बनाने की कोशिश की। साथ ही, नासिक स्थित महाराष्ट्र पुलिस अकादमी को टी-शर्ट सप्लाई करने का एक नकली कॉन्ट्रैक्ट भी दिखाया गया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, इन दस्तावेजों को असली बताकर पेश किया गया और ठाणे के सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में पंजीकृत होने का दावा करते हुए फर्जी जमीन के कागजात दिखाए गए। इनकी फोटोकॉपी निवेशकों में बांटी गई, जिससे उनका विश्वास जीता गया और 7.42 करोड़ रुपये से अधिक की राशि इकट्ठा कर उसका गबन किया गया।
बचाव पक्ष ने दलील दी कि पुरुषोत्तम चव्हाण को पिछले साल 18 जून को गिरफ्तार किया गया था और तब से वे हिरासत में हैं। इस दौरान वे प्रवर्तन निदेशालय (ED) की एक संबंधित जांच का भी सामना कर रहे थे। वर्तमान मामले में जांच पूरी हो चुकी है, चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और सभी दस्तावेजी व इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य—जैसे बैंक खातों के विवरण—पहले ही जब्त किए जा चुके हैं तथा संबंधित खाते फ्रीज कर दिए गए हैं।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि यह मामला मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा सुना जा सकता है और इसमें न तो मौत की सजा है और न ही उम्रकैद का प्रावधान। उन्होंने यह भी बताया कि हाई कोर्ट ने पहले ही ED मामले में लंबी हिरासत के आधार पर पुरुषोत्तम चव्हाण को जमानत दी थी। इसलिए इस मामले में भी जांच पूरी होने के बावजूद उन्हें हिरासत में रखना बिना सुनवाई के दंडित करने जैसा होगा।
वहीं, राज्य पक्ष ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि पुरुषोत्तम चव्हाण की संलिप्तता के पर्याप्त सबूत हैं और उनके बाहर आने पर साक्ष्यों से छेड़छाड़ या संपत्तियों के निपटान का खतरा है।
हालांकि अदालत ने इस दलील को अपर्याप्त मानते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि जांच पूरी हो जाने और सबूत सुरक्षित होने के बाद, साक्ष्यों से छेड़छाड़ के जोखिम को शर्तों के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है और यह अनिश्चितकालीन हिरासत का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने यह भी नोट किया कि पर्याप्त हिरासत के बावजूद जांच एजेंसी आरोपी से कोई संपत्ति बरामद नहीं कर सकी है और सभी जरूरी सामग्री पहले ही उसके पास है।
अदालत ने कहा कि लगभग एक साल की हिरासत और निकट भविष्य में सुनवाई शुरू होने की संभावना न होने के कारण जमानत देना उचित है। साथ ही, केवल आपराधिक पृष्ठभूमि का होना जमानत से इन्कार करने का आधार नहीं हो सकता, खासकर जब मामला मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय हो और अभियोजन के सबूत सुरक्षित हों।
