लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को ब्रिगेडियर पद पर पदोन्नति

लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित

भारतीय सेना ने शुक्रवार को लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित को ब्रिगेडियर पद पर पदोन्नति की मंजूरी दे दी है। यह पदोन्नति Armed Forces Tribunal (AFT) में हुई सुनवाई के बाद संभव हुई, जिसने पहले उनके 31 मार्च 2026 को निर्धारित सेवानिवृत्ति को रोक दिया था, ताकि उनकी लंबित पदोन्नति याचिका पर विचार किया जा सके।

बता दें कि लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित का रिटायरमेंट 31 मार्च 2026 को होना था। हालांकि, उन्होंने प्रमोशन और उससे जुड़े सेवा लाभ न मिलने को लेकर AFT का रुख किया था। उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए ट्रिब्यूनल ने रक्षा मंत्रालय को नोटिस जारी किया और आदेश दिया कि उनका रिटायरमेंट तब तक स्थगित रखा जाए, जब तक उनकी वैधानिक शिकायत पर अंतिम निर्णय नहीं ले लिया जाता।

प्रसाद पुरोहित ने दलील दी थी कि 2008 के मालेगांव विस्फोट मामले की लंबी कानूनी कार्यवाही के कारण उनके करियर की प्रगति अनुचित रूप से रुक गई, जबकि उनके बैचमेट्स और जूनियर अधिकारी इस दौरान पदोन्नति पाते रहे। जुलाई 2025 में एक विशेष NIA अदालत द्वारा बरी किए जाने के बाद उन्होंने सेवा लाभों में समानता (पैरिटी) की मांग की और कहा कि कानूनी कार्यवाही के कारण उन्हें समय पर पदोन्नति के अवसर से वंचित होना पड़ा।

गौरतलब है कि 31 जुलाई को मुंबई की NIA विशेष अदालत ने मालेगांव बम विस्फोट मामले में कर्नल प्रसाद पुरोहित समेत 7 आरोपियों को बरी कर दिया था। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। इस मामले में शुरू में 11 लोगों को आरोपी बनाया गया था, लेकिन अंततः सात आरोपियों पर ही आरोप तय हुए थे।

सूत्रों के अनुसार, उन्हें ब्रिगेडियर पद देने का निर्णय उनकी पूरी सेवा रिकॉर्ड की व्यापक समीक्षा और उनके करियर को प्रभावित करने वाली असाधारण परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लिया गया।

वरिष्ठ रक्षा अधिकारियों के अनुसार, इस फैसले को संस्थागत संतुलन बहाल करने और देरी के कारण हुए पेशेवर नुकसान को दूर करने के लिए एक दुर्लभ लेकिन आवश्यक कदम माना जा रहा है। सामान्यतः ब्रिगेडियर पद पर पदोन्नति के लिए सख्त चयन प्रक्रिया, प्रदर्शन मूल्यांकन और सतर्कता मंजूरी की आवश्यकता होती है, लेकिन इस मामले में उनकी पूर्ण बरी होने के बाद मानक प्रक्रियाओं और न्यायिक निगरानी के बीच संतुलन बनाना जरूरी था।

इस पदोन्नति के साथ, ब्रिगेडियर पुरोहित सेना के नियमों के अनुसार सेवा में बने रहेंगे। उनकी शेष सेवा अवधि को देखते हुए, उनकी तैनाती सेना की सामान्य आवश्यकताओं और प्रशासनिक विचारों के आधार पर तय की जाएगी। यह घटनाक्रम उनके सैन्य करियर के लंबे समय से चले आ रहे अध्याय को समाप्त करता है और उन अन्य अधिकारियों के लिए एक संभावित उदाहरण स्थापित करता है, जिनकी पदोन्नति लंबी कानूनी प्रक्रियाओं के कारण प्रभावित हुई है।

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