पूरी फीस न देने पर वकील ने क्लाइंट पर कोर्ट में किया मुकदमा

वकील हरीश नायर

महाराष्ट्र के ठाणे जिले के कल्याण की सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की अदालत ने वकील हरीश हरिदास नायर की याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके क्लाइंट को 35,000 रुपये की बकाया पेशेवर फीस, उस पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज और मुकदमे का खर्च चुकाने का आदेश दिया है। जज ने यह आदेश 4 अगस्त 2026 को रेगुलर सिविल सूट नंबर- 122/2024 में दिया।

वकील हरीश नायर ने कल्याण की अदालत में एक क्लाइंट के तलाक के मामले में पैरवी की थी। दोनों के बीच पेशेवर फीस 50,000 रुपये तय हुई थी। क्लाइंट ने शुरुआत में 15,000 रुपये का भुगतान किया, लेकिन बाकी 35,000 रुपये नहीं दिए। हरीश नायर का कहना है कि उन्होंने लंबे समय तक क्लाइंट से भुगतान के लिए संपर्क किया और कई बार याद दिलाया। क्लाइंट ने हर बार भुगतान का आश्वासन दिया लेकिन बकाया फीस नहीं दी।

करीब दो साल तक इंतजार करने के बाद हरीश नायर ने 22 नवंबर 2023 को कानूनी नोटिस भेजा। नोटिस का भी कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने बकाया फीस की वसूली के लिए कल्याण सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया।

मामले की सुनवाई के दौरान प्रतिवादी को अदालत की ओर से समन भेजा गया, लेकिन वह कोर्ट में पेश नहीं हुआ। न ही उसने हरीश नायर के दावों का विरोध किया और न ही उनसे जिरह की। ऐसे में अदालत ने मामले की एकतरफा सुनवाई (Ex Parte) की।

अदालत ने दस्तावेजों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर माना कि हरीश नायर ने क्लाइंट की ओर से तलाक के मामले में पैरवी की थी और दोनों के बीच 50,000 रुपये की पेशेवर फीस तय हुई थी। कोर्ट ने यह भी माना कि क्लाइंट ने केवल 15,000 रुपये का भुगतान किया था और 35,000 रुपये अभी भी बकाया थे।

वकील हरीश नायर ने बकाया रकम पर 18 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की मांग की थी। हालांकि, अदालत ने उनकी मांग को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि 18 प्रतिशत ब्याज देने का कोई व्यावसायिक समझौता या स्पष्ट प्रावधान सामने नहीं आया है। हालांकि बकाया फीस का भुगतान किया जाना वैध रूप से जरूरी है। इसलिए अदालत ने 6 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज को उचित माना। अदालत ने आदेश दिया कि क्लाइंट को 35,000 रुपये बकाया फीस + 6% वार्षिक ब्याज + मुकदमे का खर्च चुकाना होगा। अदालत ने पूरी राशि का भुगतान एक महीने के भीतर करने का भी निर्देश दिया है।

वकील हरीश नायर का कहना है कि- क्लाइंट को तलाक मिल गया। उसने दोबारा शादी कर ली और जिंदगी में आगे बढ़ गया। बस एक चीज आगे नहीं बढ़ी—मेरी फीस।

हरीश नायर को उम्मीद है कि अदालत का यह फैसला अन्य अधिवक्ताओं को भी अपनी मेहनत की फीस कानूनी तरीके से वसूलने के लिए प्रोत्साहित करेगा।

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