गंगा-जमुनी तो छोड़िए इनमें गंगा-जमजमी तहजीब भी नहीं है, गाय का खून बहाने वाले किस दावे से गंगा की गोद में तिजारत का हक मांग रहे हैं

 

अकेला

भारत देश में हिंदुओं का कोई भी मामला हो, मुसलमानों के तथाकथित हमदर्द नेताओं को उसमें अपनी नाक घुसाए बगैर चैन नहीं पड़ता! समान नागरिक संहिता की बात हो तो इनके पेट में दर्द, सीएए की बात हो तो इनके पेट में दर्द, मस्जिद के नीचे दबे मंदिर की बात हो तो इनके पेट में दर्द और हिंदू एकता की बात हो तो इनके पेट में दर्द… हिंदू राष्ट्र की बात सुनकर तो खैर, ये लगभग पागल ही हो जाते हैं। इनके लिए हिंदू धर्म, सनातन धर्म, हिंदुस्तान, हिंदुत्व, भगवा जैसे शब्द सांप्रदायिक हैं और हिंदू-मुस्लिम संबंधों को परिभाषित करने के लिए भाईचारा, गंगा-जमुनी तहजीब, राम-रहीम की जोड़ी जैसे कुछ रूपकों के अलावा और कोई शब्द इनकी डिक्शनरी में नहीं है।

हिंदू-मुस्लिम में कौन “भाई” और कौन “चारा” है? इस सवाल के जवाब में इनकी नानी मर जाती है।

भारत को गुलाम बनाने वाले अंग्रेज दुश्मन, तो मुगल दोस्त कैसे? पूछो तो हिंदुओं को ही बाहर से आया बताकर “व्हाट अबाउटिज्म” का वामपंथी दांव खेलने लगते हैं। “लव जिहाद”, “लैंड जिहाद” से लेकर “थूक जिहाद” जैसे मसलों पर सवाल पूछो तो इनकी जुबान को लकवा मार जाता है…बांग्लादेश से रोहिंग्या आ जाएं, इन्हें खुशी-खुशी कबूल, लेकिन पाकिस्तान या अफगानिस्तान से सताए हिंदुओं / सिखों का भारत आना इन्हें नागवार लगता है। फिलीस्तीन के लिए जार-जार आंसू बहाना इनका कौमी फर्ज है, मगर बांग्लादेश के हिंदुओं के लिए भारतवासियों की चिंता इनके लिए दूसरे देश के मामले में दखल देना है.

अकबर रोड और हुमायूं रोड का नाम बदल दो तो कहते हैं कि नाम बदलने से क्या इतिहास बदल जाएगा? जबकि इतिहास को बदलने (विद्रूप करने) के लिए किस पैमाने पर मंदिरों को तहस-नहस कर ऊपर मुगलिया ढांचे खड़े किए गए, उसकी चर्चा ये दबी जुबान भी नहीं करना चाहते. हालांकि उसकी साजिश परत-दर-परत अब खुद उधड़ रही है। फिर भी ये नेता हजार साल के रक्तरंजित इतिहास को सूफिज्म की हरी-भरी चादर से ढंक कर बेशर्मी से यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि अरब, तुर्की, फारस, मंगोल वगैरह-वगैरह से आए उनके पूर्वजों ने तलवार के जोर पर नहीं, बल्कि ‘मोहब्बत की दुकान” का लाइसेंस बांट-बांट कर अपने धर्म का प्रचार- प्रसार किया!

ढूंढ़ने जाएं तो ऐसे हजारों उदाहरण मिल जाएंगे, जिनके आईने में इन तथाकथित रहनुमाओं को उनकी दुबत्ती जुबान का नंगापन आसानी से दिखाया जा सकता है।

खैर, ताजा मामला हिंदुओं के महामेले यानी महाकुम्भ से जुड़ा है। जैसा कि आप सभी जानते हैं, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने हाल ही में कहा था कि इस बार महाकुम्भ कुंभ में आधार कार्ड देख कर ही लोगों को प्रवेश दिया जाए ताकि कोई गैर सनातनी (पढ़ें- मुसलमान) मेला क्षेत्र में दाखिल ना होने पाए। बाबा बागेश्वर धाम के पंडित धीरेंद्र शास्त्री ने भी महाकुंभ में मुसलमानों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। इसके पीछे उनके कई तर्क हैं और सभी जायज़ हैं। पहला, जब मक्का-मदीना में गैर मुस्लिमों का प्रवेश निषिद्ध है तो महाकुंभ में गैर सनातनी को प्रवेश क्यों? दूसरा- जब मुस्लिमों को सनातन धर्म की कोई जानकारी नहीं, साधु-संतों की मर्यादा का कोई ज्ञान नहीं, शुद्धि-अशुद्धि का कोई भान नहीं, पूजा-परंपरा में कोई आस्था भी नहीं, तो वहां जाने की वजह क्या है?

लव जिहाद और थूक जिहाद के चलते तो वैसे ही इन “कट्टर पंथियों” को कोई अपने आस-पास भी देखना नहीं चाहता।

हर जुम्मे को रोड जाम करने के लिए अपनी धार्मिक पहचान को बिल्ले की तरह सिर-माथे पर चिपकाए मुसलमान आखिर क्यों कांवड़ियों को अपनी पहचान छिपा कर खाना खिलाना चाहते हैं? आखिर क्या मकसद है? माता वैष्णो देवी या कन्हैया या जय भोले नाम की आड़ में अपने ढाबे या होटल में मुफ्त भी तो नहीं खिला रहे कि “गुप्त दान – महा कल्याण” जैसा कोई पुण्य कमाने का तरीका समझा जाए…

ये तो मकसद है नहीं। मकसद तो जाकिर नाइक वाला है। कुफ्र, काफिर, हराम, हलाल, जन्नत, जहन्नुम, 72 हूरें, जैसे शब्दों के इर्द-गिर्द घूमने वाली जाकिर के शागिर्दाे की दुनिया बहुत बड़ी नहीं है। लेकिन मुखर बहुत है। ये तालाब की उस अकेली मछली की तरह हैं, जो कि अपने दम पर सारा पानी गंदला करने का माद्दा रखती है। ये चंद लोग अपने फायदे के लिए जहरीली बयानबाजी कर माहौल को खराब करने से बाज नहीं आते। इसके चलते आज एक पूरी कौम को शक की नजर से देखा जाने लगा है। महाकुंभ में बड़े पैमाने पर मुसलमानों का धर्मांतरण कराए जाने का अंदेशा जताना और महाकुंभ का आयोजन वक्फ की जमीन पर होने का दावा ऐसी ही भड़काऊ बयानबाजी है। और बात सिर्फ़ बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि दोनों समुदायों के बीच की खाई कभी पट न सके, इसके लिए कुछ धर्मांध तत्व नफरत की इबारत कुछ इस तरह लिख देते हैं…

महाकुंभ शुरू होने से एक दिन पहले कर्नाटक में गायों के थन काट दिए जाते हैं। गुजरात से महाकुंभ के लिए यात्रियों को लेकर रवाना हुई ट्रेन पर पत्थर फेंके जाते हैं। कौन कहेगा कि ये मोहब्बत का पैगाम है? ये गंगा-जमुनी तो छोड़िए, गंगा-जमजमी तहजीब भी कहलाने लायक नहीं है। सवाल है कि गाय का खून बहाने वाले किस दावे से गंगा की गोद में तिजारत का हक मांग सकते हैं? सवाल यह भी है कि जो भारत को माता नहीं मानते, जो गंगा को मैया नहीं मानते, जो गाय को मां नहीं मानते, क्या उन्हें महाकुंभ में आना चाहिए?

और सवाल यह भी है कि मूर्ति पूजा का सामान बेचकर या चंदन तिलक लगाए भगवाधारी को पान बेचकर या ओला-उबर की सेवाएं देकर होने वाली आमदनी “हलाल सर्टिफाइड” कैसे हो जाएगी? और फिर ये मुस्लिम परस्त नेता ही तो कहते थे कि मंदिर-वंदिर से कौन सा रोजगार मिलने वाला है? जब रोजगार नहीं मिलने वाला, तो अब काहें रिरिया रहे हो बे !!

इन सवालों का जवाब ईमानदारी से देने की हिम्मत न तो मुस्लिम समुदाय में है और ना ही हिंदू समाज में। मुस्लिम समुदाय तो “विक्टिम कार्ड” खेलने में माहिर है, लेकिन असली समस्या हिंदुओं के साथ है। इतने सालों से विक्टिम होते हुए भी उन्हें “विक्टिम कार्ड” खेलना नहीं आया। हालांकि, वे कभी विक्टिम नहीं बनते और ना ही उनको “विक्टिम कार्ड” की जरूरत पड़ती, अगर वे अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान की प्रतीक गाय और गंगा की रक्षा के लिए गीता की शिक्षाओं को याद रखते। कृष्ण-नीति का अनुसरण करते हुए हिंदू चेतना अगर अर्जुन की तरह जागृत हो गई होती तो विधर्मी शिखंडियों के हौसले आज इतने बुलंद नहीं होते!!

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