पवनराजे निंबालकर
शिवसेना (यूबीटी) में संभावित दूसरी टूट को लेकर चल रही तीखी अटकलों के बीच 20 साल पुराने एक राजनीतिक हत्या कांड और उसके महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीति पर दूरगामी असर की फिर चर्चा शुरू हो गई है।
3 जून 2006 को कांग्रेस नेता पवनराजे निंबालकर और उनके चालक समद अब्दुल वहीद काज़ी की हत्या कर दी गई थी। दोनों पुणे से मुंबई जा रहे थे। नवी मुंबई के कलंबोली में चार लोगों ने टाटा इंडिका कार से उनकी स्कोडा को रोका। पीछे की सीट पर ऊंघ रहे निंबालकर और उनके ड्राइवर को गोली मार दी गई।
20 वर्षों में इस हत्या की जांच कई एजेंसियों ने की और मामला कई अदालतों से गुजरता रहा। मंगलवार को सीबीआई की विशेष अदालत में फैसला सुनाया जाना था। अदालत में पत्रकारों और आरोपियों के परिवार मौजूद थे। मुख्य आरोपी 86 वर्षीय पद्मसिंह बाजीराव पाटिल भी व्हीलचेयर पर अदालत पहुंचे। वे महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री, अविभाजित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के वरिष्ठ नेता और उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार के सौतेले भाई हैं।
अदालत के दूसरे पक्ष में पीड़ित पवनराजे निंबालकर के बेटे ओमराजे निंबालकर मौजूद थे, जो वर्तमान में धाराशिव (पूर्व नाम उस्मानाबाद) से सांसद हैं और शिवसेना (यूबीटी) के कथित छह असंतुष्ट सांसदों में शामिल बताए जाते हैं।
हालांकि मंगलवार शाम अदालत ने मई के बाद दूसरी बार फैसला टाल दिया। अब निर्णय 20 जून को सुनाया जाएगा, जो शिवसेना के 60वें स्थापना दिवस के एक दिन बाद है।
नई दिल्ली में प्रेस वार्ता के दौरान शिवसेना (यूबीटी) सांसद और प्रवक्ता संजय राउत ने दावा किया कि पार्टी में दूसरी टूट कराने के लिए उनके साथियों को कई तरह के प्रलोभन दिए जा रहे हैं।संजय राउत ने बिना किसी पुष्ट प्रमाण के आरोप लगाया कि ओमराजे निंबालकर को इस मामले में अनुकूल फैसला दिलाने का आश्वासन दिया गया है। ओमराजे निंबालकर लंबे समय से मामले के सभी 9 आरोपियों को दोषी ठहराने की मांग कर रहे हैं।
हालांकि संजय राउत के आरोप अपुष्ट हैं, लेकिन यह मामला महाराष्ट्र की राजनीति की लंबे समय से चली आ रही जटिल और धुंधली तस्वीर की याद दिलाता है।
पवनराजे निंबालकर और पद्मसिंह पाटिल आपस में चचेरे भाई थे। दोनों परिवार मराठवाड़ा के उस्मानाबाद की राजनीति पर विभिन्न सहकारी संस्थाओं, विशेषकर तेरणा शुगर सहकारी संस्था के माध्यम से प्रभाव रखते थे।
1999 में जब शरद पवार ने कांग्रेस छोड़कर NCP बनाई, तब पद्मसिंह उनके साथ चले गए। बाद में निंबालकर कांग्रेस में शामिल हुए और 2004 विधानसभा चुनाव में अपने चचेरे भाई के खिलाफ चुनाव लड़ा, जिसमें वे मामूली अंतर से हार गए। इसके बाद उनकी कारोबारी साझेदारियों पर भी असर पड़ने लगा।
CBI के अनुसार हत्या का कथित कारण कारगिल युद्ध के बाद जुटाए गए फंड में कथित घोटाले से जुड़ा था। आरोप था कि उस समय राज्य मंत्री और तेरणा शुगर सहकारी संस्था के अध्यक्ष पद्मसिंह पाटिल ने कारगिल शहीदों के परिवारों के लिए जुटाई गई राशि का दुरुपयोग किया।
CBI ने कहा कि भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे ने इस कथित घोटाले को उजागर किया था और उन्हें जानकारी कथित तौर पर पवनराजे निंबालकर ने दी थी। अदालत में दिए बयान में अन्ना हज़ारे ने दावा किया कि पद्मसिंह पाटिल उन्हें भी रास्ते से हटाने की योजना बना रहे थे।
मामले के अन्य आरोपियों में दिनेश तिवारी और पिंटू सिंह चौधरी शामिल हैं, जिन पर गोली चलाने का आरोप है। अन्य आरोपियों में परसमल बादला, ज्ञानेंद्र पांडे, पूर्व पार्षद मोहन शुक्ला, कारोबारी सतीश मंडाडे, तथा पूर्व राज्य आबकारी अधिकारी शशिकांत कुलकर्णी शामिल हैं। फिलहाल सभी नौ आरोपी जमानत पर बाहर हैं।
कलंबोली पुलिस और नवी मुंबई क्राइम ब्रांच के जांच में प्रगति न होने के बाद निंबालकर की पत्नी आनंदीबाई ने बॉम्बे हाई कोर्ट में CBI जांच की मांग की थी। उन्होंने याचिका में पद्मसिंह पाटिल को मुख्य संदिग्ध बताया और कहा कि 2004 चुनाव में बेहद कम अंतर से जीतने के बाद पद्मसिंह पाटिल उनके पति को राजनीतिक खतरा मानने लगे थे।
CBI के अनुसार, इस मामले का खुलासा तब हुआ जब किसी अन्य मामले में हिरासत में मौजूद परसमल बादला ने कथित साजिश का खुलासा किया। आरोप है कि हत्या वाले दिन उसने खुद को महेंद्र जैन बताकर पवनराजे निंबालकर को फोन किया और जमीन खरीदने के बहाने मिलने बुलाया।
पिता की हत्या के समय 22 वर्षीय ओमराजे निम्बालकर बाद में शिवसेना में शामिल हुए। 2009 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने पद्मसिंह पाटिल के बेटे राणा जगजीत सिंह को हराया। 2014 में राणा जगजीतसिंह ने NCP टिकट पर उन्हें हराया, बाद में वे भाजपा में शामिल हो गए। दूसरी ओर ओमराजे निम्बालकर लोकसभा राजनीति में आए और दो बार सांसद चुने गए।
2022 में जब एकनाथ शिंदे ने शिवसेना में विभाजन किया, तब ओमराजे निम्बालकर ने उद्धव ठाकरे के साथ बने रहने का फैसला किया।
पवनराजे निंबालकर हत्याकांड महाराष्ट्र के सबसे चर्चित राजनीतिक हत्या मामलों में से एक रहा है, और राज्य की राजनीतिक उठापटक भी कम नाटकीय नहीं रही है।
