बॉम्बे हाईकोर्ट ने वर्ष 2023 में गैंगस्टर अतीक अहमद और अशरफ अहमद की हत्या की निंदा करने वाले कथित बैनर को छापने और सार्वजनिक रूप से लगाने के आरोप में प्रिंटिंग प्रेस के मालिक और उसके कर्मचारी के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इन्कार कर दिया। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया बैनर की सामग्री धार्मिक वैमनस्य को बढ़ावा देने और धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली प्रतीत होती है।
बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद खंडपीठ में न्यायमूर्ति नीरज धोते ने कहा कि बैनर को सामान्य रूप से पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि उसमें एक विशेष धर्म का उल्लेख किया गया है तथा उसके खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया है, जिससे भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत अपराध बनता है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, अप्रैल 2023 में उत्तर प्रदेश में पुलिस हिरासत के दौरान अतीक अहमद और अशरफ अहमद की हत्या के बाद महाराष्ट्र के बीड़ जिले के माजलगांव स्थित डॉ. आंबेडकर चौक पर 15×10 फुट का एक फ्लेक्स बैनर लगाया गया था। इस बैनर में हत्याओं की निंदा करते हुए कथित तौर पर हिंदू समुदाय के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया था और चेतावनी दी गई थी कि इसके जिम्मेदार लोगों को परिणाम भुगतने होंगे। इस होर्डिंग में दोनों भाइयों (अतीक अहमद और अशरफ अहमद) को शहीद बताया गया था।
इस मामले में IPC की धारा 153A, 188, 294, 295A, 298 और 505(2) को धारा 34 के साथ तथा महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 135 के तहत FIR दर्ज की गई। राज्य सरकार का आरोप था कि बैनर का उद्देश्य विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच वैमनस्य, घृणा और दुश्मनी फैलाना था। जांच में सामने आया कि आवेदक शेख वाजेद ने अपने प्रिंटिंग प्रेस में यह बैनर छापा था, जबकि सह-आवेदक शेख नासिर ने उसे सार्वजनिक चौक पर चिपकाया और प्रदर्शित किया था।
FIR और आपराधिक कार्यवाही रद्द कराने की मांग करते हुए आवेदकों ने दलील दी कि उन्होंने केवल दो सह-आरोपियों के निर्देश पर बैनर छापा और लगाया था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष के आरोपों को सही मान भी लिया जाए, तब भी उनके खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता। राज्य सरकार ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा कि बैनर में इस्तेमाल की गई भाषा स्पष्ट रूप से धार्मिक भावनाओं को आहत करने से जुड़े अपराधों के दायरे में आती है और आवेदकों को इसकी सामग्री की पूरी जानकारी थी।
याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति नीरज धोते ने कहा कि आवेदकों द्वारा जिन सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया गया है, वे इस मामले के तथ्यों से भिन्न हैं। न्यायमूर्ति नीरज धोते ने अपने आदेश में कहा, “संदेशों को सावधानीपूर्वक पढ़ने से स्पष्ट होता है कि उनमें एक धर्म का उल्लेख है और उस धर्म के प्रति अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। इस सामग्री को यथावत स्वीकार करने पर प्रथम दृष्टया अपराध बनता है।”
न्यायमूर्ति नीरज धोते ने आगे कहा कि केवल इस आधार पर कि एक व्यक्ति ने बैनर छापा और दूसरे ने उसे सार्वजनिक स्थान पर लगाया, वे अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। प्रथम दृष्टया यह माना जा सकता है कि उन्हें इस बात की जानकारी थी कि बैनर के प्रकाशन से धार्मिक भावनाएं आहत होंगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि FIR रद्द करने की याचिका पर सुनवाई के दौरान मामले का विस्तृत परीक्षण (मिनी ट्रायल) नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
