नाना पाटेकर रहा होगा अच्छा एक्टर, लेकिन आदमी के तौर पर बदतमीज़ था!

 

अकेला

किसी के मरने के बाद उसकी बुराइयों पर पर्दा डालना और सिर्फ़ तारीफ़ों के पुल बाँधना मुझे कभी सही नहीं लगा। नाना पाटेकर को लेकर मेरी अपनी यादें और अनुभव अच्छे नहीं रहे। लोग उन्हें महान अभिनेता कहें, मुझे ऐतराज़ नहीं, लेकिन मैं वही कहूँगा, जो मैंने महसूस किया। एक नए पत्रकार के तौर पर उनके व्यवहार ने मुझे आहत किया था। इसलिए उनके निधन पर मैं बनावटी तारीफ़ करने के बजाय अपनी कड़वी राय बेबाकी से रख रहा हूँ।

बात वर्ष 1995-1996 की है। मैं ‘दो बजे दोपहर’ अखबार में पदोन्नत होकर प्रूफ रीडर से रिपोर्टर बना दिया गया था। मुझे BMC बीट दी गयी थी। मसलन, मैं BMC की रिपोर्टिंग करता था। उस समय ‘दो बजे दोपहर’ में एक कॉलम शुरू हुआ था, जिसका नाम था ‘आपकी अदालत।’ इसके तहत किसी चर्चित व्यक्ति का इंटरव्यू लेना होता था। इसके पहले उस शख्सियत की इजाज़त लेकर एक सप्ताह तक न्यूज़पेपर में इश्तिहार देना होता था कि अगले हफ़्ते ‘आपकी अदालत’ में फलाँ शख्सियत आएगी। जनता से अपील की जाती थी कि अगर आपको इनसे कोई शिकवा-शिकायत अथवा सुझाव है, तो आप हमें लिखित में भेजें। हम उनसे आपका सवाल करेंगे। न्यूज़पेपर में उस व्यक्ति का नाम सहित सवाल छापते थे और फिर शख्सियत का जवाब।

उस समय ‘आपकी अदालत’ कॉलम बहुत हिट हुआ था। तब हितेंद्र पवार इसके इंचार्ज थे।

तब ऋतुश्री सिन्हा रेलवे और इंटरटेनमेंट (मनोरंजन, फ़िल्म) बीट कवर करती थीं। अगले हफ़्ते ‘आपकी अदालत’ के लिए उन्हें किसी फ़िल्मी हस्ती का इंटरव्यू करना था। ऋतुश्री सिन्हा को दिल्ली जाना था। उनका शेड्यूल तय था। छुट्टी मंज़ूर थी। स्टाफ कम था, तो प्रबंधन का दबाव था कि इंटरव्यू तो करना ही पड़ेगा।

तब ऋतुश्री सिन्हा ने मुझसे निवेदन किया कि इस हफ़्ते इंटरव्यू का काम मैं संभाल लूँ। प्रबंधन को उन्होंने राज़ी भी कर लिया कि ‘अकेला’ इंटरव्यू कर लेंगे। इसके लिए उन्होंने मुझे नाना पाटेकर, मनोज कुमार, प्राण, मेहुल कुमार और सदाशिव अमरापुरकर के फोन नंबर दिए।

मैं नया-नया रिपोर्टर बना था। पहला फोन मैंने नाना पाटेकर को किया। नाना पाटेकर ने फोन उठाया। मैंने कहा, “सर नमस्ते।” उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। मुझे लगा कि शायद उन्होंने सुना नहीं होगा। फिर मैंने बताया कि मैं ‘दो बजे दोपहर’ अखबार से रिपोर्टर ‘अकेला’ बोल रहा हूँ। मैं उन्हें ‘आपकी अदालत’ की थीम बताने ही वाला था कि उन्होंने कहा— “तो मुझे क्यों फोन कर रहे हो?” ऐसा बोलकर उन्होंने फोन ज़ोर से पटक दिया।

मैं शॉक्ड रह गया। नाना पाटेकर के इस व्यवहार ने मुझे आहत कर दिया। उनकी यह हरकत मेरे मन-मस्तिष्क में बैठ गयी।

‘आपकी अदालत’ कॉलम के लिए किसी का तो इंटरव्यू चाहिए था। अगले दिन मैंने प्राण को फोन किया। फोन प्राण की माताजी ने उठाया। उनके बुलाने पर प्राण आए। मैंने उन्हें कॉलम की थीम बताई। प्राण ने कॉलम की तारीफ़ की, लेकिन इंटरव्यू देने में असमर्थता जताई। उन्होंने बताया कि माताजी की तबियत ठीक नहीं रहती। घर पर रहकर मैं उनकी देखभाल कर रहा हूँ। उनके ठीक हो जाने के बाद मैं इंटरव्यू दे दूंगा।

प्राण ने जिस अपनत्व और सरलता से मुझसे बात की, लगा कि ये उच्चकोटि के इंसान और कलाकार हैं। नाना पाटेकर जैसे टुच्चे नहीं।

इसके बाद मैंने मनोज कुमार को फोन किया। मनोज कुमार ने पहले मेरा हालचाल पूछा। मेरे बारे में जानकारी ली। फिर उन्होंने भी इंटरव्यू देने में असमर्थता जता दी। उन्होंने बताया कि वे अगले ही दिन शूटिंग के लिए कश्मीर जा रहे हैं। 15 दिन का शेड्यूल है। अंत में मनोज कुमार ने कहा— “अकेला जी, मैं कश्मीर से शूटिंग से वापस आ जाऊँ, फिर आपका आदेश सर आँखों पर।”

मुझे लगा, आज मैंने सच में किसी ‘भारत कुमार’ से बात की है। ‘आपका आदेश सर आँखों पर’ आज भी मेरे कानों में ऐसे गूंजता है जैसे- “मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती।”

एक तरफ़ नाना पाटेकर थे, जिन्होंने एक नए पत्रकार को यह तक समझने का मौका नहीं दिया कि वह फोन क्यों कर रहा है। दूसरी तरफ़ मनोज कुमार थे, जो व्यस्त होने के बावजूद एक नए रिपोर्टर से अपनत्व के साथ बात कर रहे थे और कश्मीर से लौटकर इंटरव्यू देने का भरोसा भी दे रहे थे।

मेरे लिए यही बड़ा कलाकार होने और बड़ा इंसान होने के बीच का फ़र्क था।

फिर मैंने निर्माता-निर्देशक मेहुल कुमार को फोन किया। उन्होंने मेरी पूरी बात सुनी और इंटरव्यू देने को राज़ी हो गए। तय वक्त पर उन्होंने मुझे अँधेरी के एक स्टूडियो में बुलाया। इंटरव्यू दिया। स्टूडियो में किसी फ़िल्म की शूटिंग की तैयारी चल रही थी। मेहुल कुमार के पास वक्त था। उन्होंने मुझसे खूब बातें कीं।

मेहुल कुमार का व्यवहार, बात करने का तरीका और सीखने की ललक देखकर मैंने अपने मन में कहा—संस्कारी, इंसानियत वाला निर्माता-निर्देशक ऐसा होना चाहिए।

बात इंसानियत, बेवकूफ़ियत और बदमिज़ाजी की हो रही है, तो इससे जुड़ी एक और घटना का ज़िक्र यहां कर देता हूँ।

भारतीय क्रिकेट टीम सीरीज़ खेलने ऑस्ट्रेलिया जा रही थी। कुलाबा के ताज होटल में इसकी घोषणा होने वाली थी। BCCI का इन्विटेशन आया था। संपादक जी ने इन्विटेशन लेटर मुझे दे दिया और बोला, “पॉसिबल होगा तो किसी खिलाड़ी से ‘आपकी अदालत’ कॉलम के लिए बात कर लेना।”

मैं ताज होटल चला गया। प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद सब लंच कर रहे थे। मैंने देखा कि कृष्णामाचारी श्रीकांत साइड में खड़े होकर खा रहे थे। मैंने उन्हें इंटरव्यू के लिए ‘आपकी अदालत’ की थीम बताई।

मुझे एहसास हुआ कि उन्हें हिंदी समझ में नहीं आयी। उन्होंने इशारे से एक व्यक्ति को बुलाया। उसको अंग्रेज़ी में बोला कि देखो, ये क्या बोल रहा है। मैंने उस व्यक्ति को डिटेल्स में बताया, तो उन्होंने अंग्रेज़ी में श्रीकांत को समझाया। श्रीकांत ने इंटरव्यू के लिए इन्कार कर दिया। शायद हिंदी की वजह से।

फिर वहीं सुनील गावस्कर डायस पर अकेले बैठे कुछ पेपर पर साइन कर रहे थे। मैंने उन्हें इंटरव्यू की बात बताई।

सुनील गावस्कर ने भी प्राण और मनोज कुमार जैसा बर्ताव किया। उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया टूर से वापस आ जाऊँ, तो इंटरव्यू श्योर दूँगा। उन्होंने मुझसे यह भी पूछा, “लंच किया क्या?”

तीन दशक बीत गए, लेकिन नाना पाटेकर की बदतमीज़ी और मेहुल कुमार, प्राण, मनोज कुमार तथा सुनील गावस्कर का सम्मान मेरी स्मृतियों से मिटा नहीं।

नाना पाटेकर के निधन (1 जनवरी 1951 – 8 अक्टूबर 2026) पर आज मुझसे औपचारिक श्रद्धांजलि की उम्मीद न की जाए। मैं उनकी अदाकारी का मूल्यांकन नहीं कर रहा, अपने अनुभव का हिसाब रख रहा हूँ। मैं अपनी यादों को सिर्फ़ इसलिए नहीं बदल सकता कि आज उनके बारे में अच्छी-अच्छी बातें लिखने का चलन है।

नाना पाटेकर, तू रहा होगा बड़ा एक्टर, लेकिन आदमी के तौर पर बदतमीज़ था! ये पूरा बॉलीवुड जानता है। अभिनेत्री तनुश्री दत्ता भी जानती है।

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