बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार को कानून एवं न्याय विभाग के सचिव और वरिष्ठ विधि सलाहकार दिलीप घुमरे को अवमानना नोटिस जारी किया। यह कार्रवाई एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान अदालत प्रशासन के खिलाफ कथित तौर पर “आक्रामक और ऊंची आवाज में” टिप्पणी करने को लेकर की गई।
न्यायमूर्ति ए.एस. गडकरी और कमल खाता की खंडपीठ ने कहा कि दिलीप घुमरे का अदालत के खुले परिसर में, आम लोगों की मौजूदगी में किया गया “अनावश्यक आक्रोश और आक्रामक व्यवहार” न केवल अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला था, बल्कि उसकी प्राधिकारिता को कमजोर करने और कमतर दिखाने का प्रयास भी था। पीठ के अनुसार, यह भारतीय संविधान और अवमानना न्यायालय अधिनियम, 1971 के तहत अदालत की अवमानना की श्रेणी में आता है।
यह मामला वर्ष 2013 में दायर एक जनहित याचिका से संबंधित अंतरिम आवेदन की सुनवाई के दौरान सामने आया। सुनवाई के दौरान अदालत ने अपने 24 अगस्त के आदेश और दिलीप घुमरे द्वारा 27 अगस्त को दाखिल हलफनामे का उल्लेख किया। हलफनामे में दावा किया गया था कि फास्ट ट्रैक अदालतों के लिए 179 नए पद सृजित किए गए हैं।
अदालत ने अतिरिक्त सरकारी वकील (AGP) पी.पी. काकड़े से इस दावे के बारे में पूछा। जब वे स्पष्ट और निश्चित जवाब नहीं दे सके तो अदालत ने दिलीप घुमरे से संबंधित दावे की पहचान करने को कहा और पूछा कि हलफनामा किसने दाखिल किया था।
अदालत के सवाल का जवाब देने के बजाय दिलीप घुमरे ने कथित तौर पर “आक्रामक और ऊंची आवाज में” जवाब दिया और हाईकोर्ट प्रशासन को ही जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने खचाखच भरी अदालत में कथित तौर पर कहा कि 179 पदों को नहीं भरने के लिए हाईकोर्ट प्रशासन जिम्मेदार था।
पीठ ने कहा कि अदालत प्रशासन के खिलाफ खुलेआम किया गया दिलीप घुमारे का यह “असंयमित आक्रोश” अदालत की गरिमा और अधिकार पर जानबूझकर किया गया अनुचित हमला था। न्यायाधीशों ने कहा कि ऐसा आचरण किसी भी न्यायिक अधिकारी के लिए पूरी तरह अनुचित है, बेहद आपत्तिजनक है और अदालत द्वारा अपेक्षित मानकों से काफी नीचे है।
अदालत ने आगे कहा कि यह स्थापित परंपरा है कि सभी पक्षों से अदालत की कार्यवाही के दौरान मर्यादा बनाए रखने और न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता का सम्मान करने की अपेक्षा की जाती है। जब संबंधित व्यक्ति स्वयं न्यायिक अधिकारी हो तब यह जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
दिलीप घुमरे ने अदालत के समक्ष अपने व्यवहार के लिए माफी भी मांगी। हालांकि, पीठ ने कहा कि उनका आचरण “पूरी तरह अक्षम्य और स्वीकार नहीं किया जा सकता।” अदालत ने कहा कि दिलीप घुमरे यह नहीं भूल सकते कि वे एक न्यायिक अधिकारी हैं और उनका पद उन्हें अदालत के प्रति पूर्ण अनादर दिखाने का कोई विशेषाधिकार नहीं देता।
पीठ ने कहा कि यदि ऐसे व्यवहार को माफ कर दिया गया तो आम जनता के बीच यह बेहद चिंताजनक संदेश जाएगा कि कोई व्यक्ति खुले न्यायालय में ऐसा कृत्य कर सकता है और बाद में महज औपचारिक तरीके से माफी मांगकर उससे बच सकता है।
इसके बाद खंडपीठ ने रजिस्ट्रार को दिलीप घुमरे को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया और पूछा कि उनके खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही क्यों शुरू नहीं की जानी चाहिए। मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर को निर्धारित की गई है।
