बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2007 में मीठी नदी के चौड़ीकरण और गहरीकरण की परियोजना से जुड़े 115.65 करोड़ रुपये के मुकदमे को खारिज करने से इन्कार कर दिया है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि संयुक्त उपक्रम (Joint Venture) के नाम से मुकदमा दायर करना एक प्रक्रियात्मक गलती थी, जिसे कानून के तहत सुधारा जा सकता है।
न्यायमूर्ति संदीप मारणे ने मुकदमा खारिज करने की मांग वाली याचिका को खारिज करते हुए कहा कि वादी का नाम गलत तरीके से दर्ज होना अपने आप में मुकदमे को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता क्योंकि कानून ऐसी गलतियों को सुधारने की व्यवस्था देता है।
मामला मार्च 2007 में BPL-BBC Joint Venture को दिए गए ठेके से संबंधित है। इसके तहत माहिम कॉजवे से धारावी ब्रिज के बीच मीठी नदी को चौड़ा और गहरा किया जाना था।
इस संयुक्त उपक्रम में दो पंजीकृत कंपनियां शामिल थीं—Backbone Projects Ltd. (BPL) और Backbone Construction Pvt. Ltd. (BBC)।
परियोजना के क्रियान्वयन के दौरान विवाद उत्पन्न होने के बाद वर्ष 2017 में एक वाणिज्यिक मुकदमा दायर किया गया, जिसमें ब्याज सहित 115 करोड़ रुपये से अधिक की राशि की वसूली की मांग की गई।
मुकदमा खारिज करने की मांग करने वाली अर्जी में तर्क दिया गया कि Joint Venture कोई स्वतंत्र कानूनी या न्यायिक इकाई (juristic entity) नहीं है, इसलिए वह अपने नाम से अदालत में मुकदमा दायर नहीं कर सकता। इसके अनुसार मुकदमा दोनों संबंधित कंपनियों के नाम से दायर किया जाना चाहिए था।
ठेकेदार की ओर से दलील दी गई कि Joint Venture के नाम से मुकदमा दायर करना सद्भावनापूर्ण गलती (bona fide mistake) थी, क्योंकि मूल अनुबंध भी इसी नाम से किया गया था। उसने अदालत से दोनों कंपनियों को औपचारिक रूप से वादी के रूप में रिकॉर्ड पर लाने की अनुमति मांगी।
न्यायमूर्ति संदीप मारणे ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा/आदेश के तहत अदालत को पक्षकारों से संबंधित ऐसी गलतियों को सुधारने का अधिकार है।
अदालत ने टिप्पणी की कि यदि हर मुकदमे में यह पता चलने पर कि मामला गलत वादी के नाम से दायर हुआ है, सीधे plaint (वादपत्र) खारिज कर दिया जाए, तो CPC के Order I Rule 10 के तहत अदालत को दी गई पक्षकारों को जोड़ने या बदलने की शक्ति ही बेकार हो जाएगी।
अदालत ने यह भी पाया कि मूल वादपत्र में दोनों कंपनियों को पहले ही Joint Venture के सदस्यों के रूप में स्पष्ट रूप से बताया गया था। इसलिए अदालत ने माना कि यह कमी सुधारी जा सकने वाली प्रक्रियात्मक त्रुटि है।
इसी आधार पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने वादपत्र खारिज करने से इन्कार कर दिया और मुकदमे को आगे बढ़ने की अनुमति दी।
