मीरा रोड में मंदिर ट्रस्ट की 300 करोड़ रुपये की जमीन हड़पने के आरोप में 10 लोगों पर केस दर्ज

 

महाराष्ट्र के ठाणे जिले के मीरा रोड में श्रीराम मंदिर देवस्थान ट्रस्ट की करीब 98 हजार वर्ग मीटर जमीन पर कब्जा करने और उसे हड़पने की साजिश रचने के आरोप में 10 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गयी है। आरोपियों में रामनगर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के साझेदार और श्रीराम मंदिर देवस्थान ट्रस्ट के पूर्व एवं वर्तमान ट्रस्टी शामिल हैं। इनके खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, जालसाजी और सरकारी दस्तावेजों में हेराफेरी समेत विभिन्न धाराओं में FIR दर्ज की गयी है।

इस जमीन की कीमत 300 करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है। FIR दर्ज होने के बाद मामले की जांच आर्थिक अपराध शाखा (EOW) को सौंप दी गई है।

आठ आरोपियों की पहचान राकेश दलचंद चौधरी, मुकेश दलचंद चौधरी, कैलाश चंद्र जैन, रमेश छगनलाल शाह, भरत शांतिलाल शाह, प्राची देवांग देसाई, दलचंद गिरधारीलाल चौधरी और रशेष भरत शाह के रूप में हुई है। यह FIR 3 नवंबर 2026 को भायंदर पूर्व निवासी रमेश कोठारी की शिकायत पर दर्ज की गई।

शिकायत के मुताबिक, रमेश कोठारी मीरा रोड में घर खरीदने की तलाश कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें शांति गार्डन इलाके में रामनगर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की ओर से विकसित किया जा रहा एक प्रोजेक्ट दिखाई दिया। प्रोजेक्ट की जमीन के मालिकाना हक और राजस्व रिकॉर्ड की जांच करने के दौरान उन्हें भूखंड के स्वामित्व से जुड़ी कई अनियमितताएं नजर आईं।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि सार्वजनिक ट्रस्ट की संपत्ति के हस्तांतरण के लिए चैरिटी कमिश्नर की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य होने के बावजूद ट्रस्ट की जमीन महज 8 लाख रुपये में मुकेश दलचंद चौधरी और दलचंद गिरधारीलाल चौधरी के नाम हस्तांतरित कर दी गई।

FIR के अनुसार, 4 मार्च 1979 को ट्रस्ट के साथ जमीन का सौदा करने से महज तीन दिन पहले दलचंद चौधरी, राकेश चौधरी और मुकेश चौधरी रामनगर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन में सक्रिय साझेदार बने थे। आरोप है कि इन तीनों ने खुद को संरक्षित किरायेदार (प्रोटेक्टेड टेनेंट) बताया और जमीन का सौदा कराने के लिए सरकार की ओर से दी जाने वाली छूट और रियायतों का अनुचित लाभ उठाया।

रमेश कोठारी ने आगे आरोप लगाया कि राजस्व रिकॉर्ड में तीनों साझेदारों के नाम अनधिकृत तरीके से हस्तलिपि और ओवरराइटिंग के जरिए दर्ज किए गए। उन्होंने चैरिटी कमिश्नर कार्यालय में जमा कराए गए दस्तावेजों की तारीखों में भी विसंगतियों की ओर इशारा किया। ये दस्तावेज 20 अक्टूबर 1981 और 30 नवंबर 1981 को तैयार किए जाने का उल्लेख करते हैं।

ट्रस्ट के मुख्य प्रबंधक और ट्रस्टी नंदलाल अग्रवाल की 1991 में मृत्यु हो गई थी। आरोप है कि इसके बाद आरोपियों ने उनके नाम से फर्जी दस्तावेज तैयार किए और 2002 में जमीन के लिए गैर-कृषि (एनए) इस्तेमाल की अनुमति हासिल करने में उनका इस्तेमाल किया।

शिकायत में शहरी भूमि (सीलिंग एवं विनियमन) अधिनियम के तहत 1989 में जारी एक आदेश का भी जिक्र किया गया है। इस आदेश के मुताबिक, 50 हजार वर्ग मीटर अतिरिक्त जमीन महाराष्ट्र सरकार को मुफ्त में सौंपनी थी, जबकि अन्य 33 हजार वर्ग मीटर जमीन आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को आवास उपलब्ध कराने के लिए मीरा-भायंदर नगर निगम को हस्तांतरित की जानी थी।

FIR में आरोप लगाया गया है कि सार्वजनिक उद्देश्य के लिए आरक्षित जमीन सरकार और नगर निगम को सौंपने के बजाय आरोपियों ने वहां व्यावसायिक दुकानें और बहुमंजिला आवासीय इमारतें विकसित कर दीं। फिलहाल इस भूखंड पर करीब 60 इमारतें बनी हुई हैं, जिनमें लगभग 1,500 लोग रहते हैं।

रमेश कोठारी का आरोप है कि इन संपत्तियों को करोड़ों रुपये में बेचा गया, लेकिन जमीन के मूल मालिक मंदिर ट्रस्ट को इन सौदों से कोई रकम नहीं मिली।

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