कमलाकर शेनॉय
मुंबई सत्र न्यायालय ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) के पूर्व पुलिस महानिदेशक सतीश माथुर और 3 अन्य पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। माझगांव कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश मुजीबुद्दीन एस. शेख ने कहा कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून बनाए गए हैं, लेकिन कृत्य और चूक (commission और omission), विशेषज्ञता की कमी और जांच में देरी जैसी समस्याएं बनी हुई हैं।
मुंबई के जाने माने RTI और सामाजिक कार्यकर्ता कमलाकर शेनॉय ने साल 2017 में सतीश माथुर, अतिरिक्त पुलिस आयुक्त केशव पाटिल, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक राजन भोगले और DG के रीडर गिरीश गोड़े के खिलाफ दादर मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट में याचिका दायर की थी। कमलाकर शेनॉय का आरोप था कि इन अधिकारियों ने उनकी शिकायत पर संज्ञान नहीं लिया। परन्तु दादर मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। तब कमलाकर शेनॉय ने माझगांव सेशंस कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की थी। इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए सत्र न्यायाधीश ने दादर मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वह इन अधिकारियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 166ए (लोक सेवक द्वारा कानून के निर्देशों की अवहेलना), 217 (किसी व्यक्ति को बचाने के लिए कानून का जानबूझकर उल्लंघन) और 218 (गलत रिकॉर्ड तैयार करना या लिखना, ताकि किसी को बचाया जा सके) को धारा 34 (सामान्य आशय) के तहत कार्रवाई करें।
कमलाकर शेनॉय ने इन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी कि उन्होंने महाराष्ट्र हाउसिंग एंड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (MHADA) और मुंबई बिल्डिंग रिपेयर्स एंड रिकंस्ट्रक्शन बोर्ड के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। कार्यकर्ता का दावा था कि डेवलपर्स ने 1,37,322.53 वर्गमीटर अतिरिक्त जमीन सरकार को नहीं सौंपी, जिससे सरकार को 14,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
कमलाकर शेनॉय का आरोप है कि पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया और केवल जांच करती रही। पूछने पर उन्हें बताया गया कि इस मामले में कानूनी राय ली जा रही है। कमलाकर शेनॉय के अनुसार, जिस विभाग में आरोपी अधिकारी कार्यरत हैं, उसी से राय लेना और गुप्त जांच करना अवैध है।
पुलिस अधिकारियों के बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी कि आरोपों के बावजूद कार्रवाई शुरू की गई थी। उन्होंने कहा कि खुली जांच की अनुमति मांगी गई थी, लेकिन अनुमति नहीं मिली, इसलिए गुप्त जांच शुरू की गई। उनका यह भी कहना था कि सक्षम प्राधिकारी या राज्य सरकार की अनुमति के बिना किसी लोक सेवक के खिलाफ सीधे अपराध दर्ज नहीं किया जा सकता।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने पाया कि अधिकारी दो साल से अधिक समय से जांच कर रहे थे। इस पर कोर्ट ने कहा, “प्रतिवादियों का यह आचरण प्रचलित कानूनों की अनदेखी और कर्तव्य में लापरवाही (dereliction of duty) के दायरे में आता है।”
