बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार को 78 वर्षीय सेवानिवृत्त IAS पिता गोरख मेघ के खिलाफ उनके बेटे जितेंद्र मेघ द्वारा शुरू की गई न्यायिक कार्यवाही को “दुर्भावनापूर्ण” करार देते हुए बेटे की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें पिता की मानसिक स्थिति की जांच के लिए मानसिक स्वास्थ्य (MH) अधिनियम, 2017 की धारा 105 के तहत एक मेडिकल बोर्ड गठित करने की मांग की गई थी। अदालत ने बेटे जितेंद्र मेघ को आदेश दिया कि वह अपने पिता गोरख मेघ को 5 लाख रुपये का भुगतान करे, क्योंकि उसने “बुजुर्ग को निरर्थक न्यायिक कार्यवाही में घसीटने का हानिकारक प्रयास” किया।
54 वर्षीय बेटे जितेंद्र मेघ की उस अपील को खारिज करते हुए, जो एकल न्यायाधीश के फरवरी में दिए गए आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, न्यायमूर्ति ए. एस. गडकरी और न्यायमूर्ति कमल काथा की खंडपीठ ने कहा कि जितेंद्र मेघ ने दावा किया था कि उसके पिता गोरख मेघ मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं और इसलिए उनकी चिकित्सकीय जांच कराई जानी चाहिए।
खंडपीठ ने कहा, “अपने वृद्ध पिता (जो विभिन्न बीमारियों से पीड़ित हैं) के खिलाफ बेटे का ऐसा आचरण किसी भी परिस्थिति में इस अदालत द्वारा बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और न ही किया जाना चाहिए। उसके आचरण के लिए उसे कड़ी फटकार लगाई जानी चाहिए।”
जितेंद्र मेघ पेशे से फोटोग्राफर है। वह चार बंगला, म्हाडा, एसवीपी नगर, अँधेरी (पश्चिम) में रहता है। जितेंद्र मेघ ने साल 2015 में अपने पिता गोरख मेघ (सेवानिवृत्त IAS) के खिलाफ पैतृक संयुक्त संपत्ति के बंटवारे के लिए मुकदमा दायर किया था, जो अभी भी अदालत में लंबित है। दिसंबर 2025 में उसने हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश के समक्ष अंतरिम आवेदन दाखिल कर MH अधिनियम के तहत एक स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड गठित करने की मांग की थी, ताकि उसके पिता की मानसिक स्थिति की जांच और आंकलन किया जा सके। जितेन्द्र मेघ का दावा था कि उसके पिता मानसिक रूप से बीमार हैं।
अपने दावे के समर्थन में बेटे ने जुलाई 2024 का एक मेडिकल प्रमाणपत्र पेश किया था। इसमें उसके पिता को मधुमेह से पीड़ित बताया गया था और इंसुलिन लेने के बाद बार-बार हाइपोग्लाइसीमिया (रक्त में शुगर का स्तर बहुत कम होना) की स्थिति तथा उससे जुड़े संज्ञानात्मक लक्षणों का उल्लेख था।
अदालत ने कहा कि जिस मेडिकल प्रमाणपत्र पर बेटे ने भरोसा किया था, उससे केवल यह पता चलता है कि उसके पिता मधुमेह के मरीज हैं और इंसुलिन लेने के बाद उन्हें हाइपोग्लाइसीमिया के दौरे पड़ते थे। इसके कारण उन्हें कुछ समय के लिए भ्रम, गलत धारणाएं, भूलने की समस्या और पसीना आने जैसे लक्षण दिखाई देते थे।
न्यायाधीशों ने विशेष रूप से कहा कि मेडिकल प्रमाणपत्र में खुद यह स्वीकार किया गया था कि ये लक्षण अस्थायी थे। उन्होंने एकल न्यायाधीश के इस निष्कर्ष से सहमति जताई कि “किसी अंतर्निहित चयापचय संबंधी बीमारी के कारण होने वाले अस्थायी और वापस सामान्य हो सकने वाले लक्षणों को प्रथम दृष्टया मानसिक बीमारी के बराबर नहीं माना जा सकता।”
न्यायमूर्ति ए. एस. गडकरी और न्यायमूर्ति कमल काथा ने कहा कि यह स्पष्ट है कि बेटे ने इससे पहले अदालत की एक अन्य खंडपीठ के समक्ष ये दलीलें नहीं उठाई थीं। उस खंडपीठ के सामने पिता की संपत्ति से बेटे को माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत बेदखल करने से संबंधित याचिका पर सुनवाई हुई थी।
अदालत ने कहा कि जुलाई 2024 का मेडिकल प्रमाणपत्र पहले से ही उस बेदखली मामले की न्यायिक रिकॉर्ड पर मौजूद था। इसके बावजूद बेटे ने MH अधिनियम के तहत पिता की मेडिकल जांच कराने के लिए एकल न्यायाधीश के समक्ष अपना अंतरिम आवेदन उस समय दाखिल किया, जब बेदखली मामले में दूसरी खंडपीठ के आदेश आने में महज कुछ दिन बाकी थे।
न्यायमूर्ति ए. एस. गडकरी और न्यायमूर्ति कमल काथा ने फरवरी में एकल न्यायाधीश द्वारा दिए गए आदेश से भी सहमति जताई। एकल न्यायाधीश ने निष्कर्ष निकाला था कि बेटे का आवेदन उसके पिता के खिलाफ “मुकदमेबाजी की रणनीति का एक साधन” था।
खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश की इस टिप्पणी से भी सहमति जताई कि MH अधिनियम “मानसिक बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों की सुरक्षा के लिए ढाल के रूप में बनाया गया है और किसी विरोधी पक्ष को उनके खिलाफ तलवार के रूप में इसका इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
न्यायाधीशों ने कहा कि बेटे का प्रयास “किसी भी तरह से बाद में गढ़ी गई दलील से कम नहीं था और यह एक दुर्भावनापूर्ण कार्यवाही थी, जिसका उद्देश्य प्रतिवादी नंबर 1 (पिता) को कई मुकदमों में घसीटना था, ताकि वह अंततः हार मान लें और अपीलकर्ता (बेटे) की मांगों के आगे झुक जाएं।”
इससे पहले एकल न्यायाधीश के समक्ष बेटे ने अपने पिता की मानसिक क्षमता पर सवाल उठाते हुए कहा था कि वह दोनों के बीच चल रहे विभिन्न आपराधिक और दीवानी विवादों का सामना करने में सक्षम नहीं हैं। बेटे ने आरोप लगाया था कि उसके पिता, जो अंधेरी में ही रहते हैं, अपनी दूसरी पत्नी के साथ अलग रहते हैं। उसकी सौतेली मां पूर्णिमा मेघ डॉक्टर हैं और बेटे ने आरोप लगाया था कि वह उसे बुजुर्ग पिता तक पहुंचने नहीं देतीं।
