बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऑस्ट्रेलियाई पारसी महिला की तलाक और 5 करोड़ रुपये गुजारा भत्ते की याचिका खारिज की, कहा- मुंबई में हुआ आयोजन शादी नहीं, ‘तंदूरस्ती’ था

 

बॉम्बे हाईकोर्ट ने पर्थ, ऑस्ट्रेलिया में रहने वाली एक पारसी महिला की तलाक याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि मुंबई में नवंबर 2010 में हुआ समारोह वैध पारसी विवाह समारोह नहीं था, बल्कि ‘तंदूरस्ती’ (आशीर्वाद समारोह) था। यह पारंपरिक पारसी-जोरास्ट्रियन प्रार्थना, आशीर्वाद और नवविवाहित जोड़े के स्वागत का आयोजन होता है। कोर्ट ने पारसी प्रतिनिधियों की जूरी के सर्वसम्मत निष्कर्ष को स्वीकार करते हुए कहा कि यह आयोजन ‘आशीर्वाद’ नहीं था, जो पारसी विवाह एवं तलाक अधिनियम, 1936 के तहत कोर्ट के अधिकार क्षेत्र के लिए जरूरी पारसी विवाह रस्म है। महिला ने 2018 में हाईकोर्ट का रुख करते हुए अपने अलग रह रहे पति से तलाक की मांग की थी। उसका दावा था कि नवंबर 2010 में मुंबई में दोनों का विवाह हुआ था। महिला ने स्थायी गुजारा भत्ते के रूप में 5 करोड़ रुपये की भी मांग की थी।

महिला के पति, जो पर्थ में ही रहते हैं, ने याचिका पर शुरुआती आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि नवंबर 2010 में मुंबई में आयोजित कार्यक्रम महज एक रिसेप्शन था और शहर में पारसी विवाह एवं तलाक अधिनियम, 1936 की धारा 3 के तहत जरूरी कोई रस्म नहीं हुई थी। इसलिए उन्होंने दलील दी कि हाईकोर्ट के पास इस वैवाहिक मामले की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र ही नहीं है। सितंबर 2024 में पारसी सत्र के दौरान कोर्ट ने इस सवाल को एक जूरी के पास भेज दिया। महिला ने जूरी के सामने मुंबई में हुए समारोह की वीडियो रिकॉर्डिंग भी पेश की। राज्य सरकार द्वारा एक पैनल में से चुने गए पांच प्रतिनिधियों वाली जूरी ने सर्वसम्मति से निष्कर्ष निकाला कि 20 नवंबर 2010 को हुआ कार्यक्रम विवाह समारोह नहीं, बल्कि ‘तंदूरस्ती’ या आशीर्वाद समारोह था। जूरी ने इसे भारत में पारसियों या ईरानी जोरास्ट्रियन समुदाय द्वारा निभाई जाने वाली ‘आशीर्वाद’ विवाह रस्म नहीं माना।

जूरी के फैसले के बाद महिला ने तर्क दिया कि मुंबई में हुआ कार्यक्रम ‘आशीर्वाद’ या आशीर्वाद समारोह ही था। उसने वीडियो का हवाला देते हुए कहा कि नवविवाहित जोड़े के चारों ओर लोग हाथों में जलती हुई मोमबत्तियां लेकर खड़े थे। उसके मुताबिक, भारत में ईरानी जोरास्ट्रियन समुदाय में ऐसी रस्म निभाई जाती है। इसलिए उसने दावा किया कि यह कार्यक्रम पारसी विवाह एवं तलाक अधिनियम के तहत विवाह समारोह माना जाना चाहिए। महिला ने यह भी दलील दी कि हाईकोर्ट जूरी की ‘राय’ से बाध्य नहीं है और यह तय करने के लिए सबूत पेश किए जाने चाहिए तथा पूरी सुनवाई होनी चाहिए कि नवंबर 2010 का कार्यक्रम वैध विवाह समारोह था या नहीं।

हालांकि, जस्टिस सोमशेखर सुंदरसन की एकल पीठ ने इस दलील को खारिज कर दिया और पति की शुरुआती आपत्ति को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों की सहमति से यह तथ्यात्मक सवाल जूरी के पास भेजा गया था कि नवंबर 2010 में मुंबई में हुआ कार्यक्रम पारसी विवाह की रस्म था या नहीं। जूरी ने सर्वसम्मति से इसका जवाब ‘नहीं’ में दिया था। कोर्ट ने कहा कि जूरी के निष्कर्ष पर महिला की आपत्ति काफी ‘सरल’ थी, क्योंकि वह केवल शब्द की व्युत्पत्ति पर आधारित थी। कोर्ट के मुताबिक, ऐसी स्थिति में अलग से सबूत पेश करने की जरूरत भी नहीं पड़ती। कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला की दलील पारसी विवाह एवं तलाक अधिनियम की व्यवस्था के विपरीत है, क्योंकि यह कानून भारत में अलग-अलग पारसी समूहों द्वारा निभाई जाने वाली अलग-अलग रस्मों को मान्यता नहीं देता।

कोर्ट ने कहा, “पारसी जोरास्ट्रियन समुदाय के सदस्यों से बनी जूरी, पारसी समुदाय की रस्मों, परंपराओं और मान्यताओं को संरक्षित रखने के लिए पीएमडीए की एक अभिन्न व्यवस्था है।”

कोर्ट ने आगे कहा, “जूरी ने अपना निष्कर्ष दे दिया है और जब तक उसमें कोई गंभीर त्रुटि या विकृति न हो, इस कोर्ट के लिए समुदाय की परंपरा से जुड़े इस सवाल पर जूरी के निष्कर्ष को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा।” हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जूरी ने स्पष्ट रूप से बताया था कि नवंबर 2010 में हुआ कार्यक्रम पारसी विवाह की रस्म क्यों नहीं माना जा सकता।

कोर्ट के अनुसार, भारत में पारसी जोरास्ट्रियन समुदाय विवाह के दौरान एक ऐसी रस्म निभाता है, जिसमें दूल्हा और दुल्हन एक पुजारी और दो गवाहों—दोनों पक्षों से एक-एक गवाह—की मौजूदगी में एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर करते हैं। कोर्ट ने कहा कि यह हर पारसी विवाह समारोह का अभिन्न हिस्सा है और इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग भी की जाती है। लेकिन नवंबर 2010 के कार्यक्रम में ऐसी कोई रस्म नहीं हुई थी। इस आवश्यक विवाह रस्म के नहीं होने के कारण मुंबई में हुआ समारोह पारसी विवाह एवं तलाक अधिनियम के तहत भारत में संपन्न पारसी विवाह नहीं माना जा सकता। इसके आधार पर हाईकोर्ट ने पति की शुरुआती आपत्ति को बरकरार रखते हुए अधिकार क्षेत्र के अभाव में महिला की वैवाहिक याचिका खारिज कर दी।

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