बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला: इस्लाम धर्म अपनाने के बाद SC/ST एक्ट लागू नहीं, IPC के तहत मुकदमा चलेगा

 

बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक महिला के देवर और ननद को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) के तहत लगाए गए आरोपों से मुक्त कर दिया। अदालत ने कहा कि कथित घटना से पहले महिला ने इस्लाम धर्म अपना लिया था, इसलिए कानून की दृष्टि में उसकी अनुसूचित जाति की स्थिति “अप्रभावी (eclipsed)” हो गई थी। हालांकि, अदालत ने आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत दर्ज अपराधों—जैसे मारपीट और अवैध रूप से घर में प्रवेश—के मामले में मुकदमे का सामना करने का निर्देश दिया।

हाई कोर्ट की कोल्हापुर पीठ की न्यायमूर्ति वृशाली जोशी ने 25 जून 2026 को यह आदेश पारित किया। अदालत ने विशेष अदालत के उस आदेश को आंशिक रूप से रद्द किया, जिसमें आरोपियों को आरोपमुक्त करने से इन्कार किया गया था।

अभियोजन के अनुसार, शिकायतकर्ता ने आवेदकों में से एक के भाई से विवाह किया था। आरोप है कि जब महिला ने घर में साफ-सफाई रखने, कम पानी इस्तेमाल करने और शौचालय साफ रखने को कहा तो विवाद शुरू हो गया। आरोपियों ने कथित रूप से उसके साथ मारपीट की, जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया और उसके घर में घुस गए।

इसके बाद IPC, SC/ST एक्ट और मुंबई पुलिस अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत FIR दर्ज की गई।

आरोपियों की ओर से वकील सत्यव्रत जोशी ने दलील दी कि यह FIR पारिवारिक संपत्ति विवाद का परिणाम थी और उनके पक्ष में दीवानी मामले में यथास्थिति (status quo) का आदेश आने के बाद दर्ज की गई। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के Chinthada Anand बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि शिकायतकर्ता इस्लाम धर्म अपना चुकी थी, इसलिए वह अत्याचार निवारण अधिनियम का लाभ नहीं ले सकती।

अभियोजन पक्ष ने आरोपमुक्त करने का विरोध किया और कहा कि केवल दीवानी विवाद होने से आपराधिक मामला समाप्त नहीं किया जा सकता। हालांकि, उसने यह स्वीकार किया कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार शिकायतकर्ता के धर्म परिवर्तन के बाद SC/ST एक्ट लागू नहीं हो सकता लेकिन IPC के तहत दर्ज अपराध बने रहेंगे।

हाई कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि शिकायतकर्ता ने अपने पूरक बयान में स्वीकार किया था कि विवाह के समय उसने इस्लाम धर्म अपना लिया था, अपना नाम बदल लिया था और तब से मुस्लिम धर्म का पालन कर रही है।

न्यायमूर्ति जोशी ने कहा- जब प्रतिवादी संख्या 2 ने इस्लाम धर्म अपना लिया और उसका पालन शुरू कर दिया तो अनुसूचित जाति के सदस्य के रूप में उसकी पूर्व जातिगत स्थिति कानून की दृष्टि में अप्रभावी हो गई। परिणामस्वरूप अत्याचार निवारण अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं होंगे।”

हालांकि अदालत ने माना कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री IPC के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनाती है और कहा कि आरोपियों को इन अपराधों के लिए मुकदमे का सामना करना होगा।

इसी के साथ हाई कोर्ट ने आरोपियों को SC/ST एक्ट और मुंबई पुलिस अधिनियम के आरोपों से मुक्त कर दिया, जबकि बाकी IPC अपराधों के लिए मुकदमा जारी रखने की अनुमति दी।

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