महाराष्ट्र राज्य सहकारी अपीलीय अदालत ने कहा है कि कोई भी सहकारी हाउसिंग सोसायटी किसी सदस्य पर एक वित्तीय वर्ष में 5,000 रुपये से अधिक का जुर्माना नहीं लगा सकती। अदालत ने दादर की एक हाउसिंग सोसायटी से जुड़े पार्किंग विवाद में दायर अपील को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया।
18 जुलाई को दिए अपने आदेश में अपीलीय अदालत ने सहकारी अदालत के अंतरिम आदेश को बरकरार रखा। इस आदेश के तहत लैंडमार्क को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी को सदस्य दीपाली भुबे पर पार्किंग जुर्माना लगाने से रोक दिया गया था। अदालत ने सोसायटी को उन्हें सुविधाजनक पार्किंग स्थान उपलब्ध कराने और विवाद का अंतिम फैसला होने तक रोजाना जुर्माना वसूलने से भी रोक दिया।
विवाद तब शुरू हुआ जब दीपाली भुबे ने शिकायत की कि उन्हें आवंटित पार्किंग स्थान अन्य पार्किंग स्थानों के बीच इस तरह घिर गया है कि उसका इस्तेमाल करना मुश्किल हो गया है। समस्या के समाधान के लिए बार-बार अनुरोध करने के बावजूद सोसायटी ने कथित तौर पर कोई कार्रवाई नहीं की। इसके बजाय, खुले स्थान पर पार्किंग करने के लिए उन पर प्रतिदिन 200 रुपये का जुर्माना लगा दिया और नौ दिनों में 1,800 रुपये वसूल लिए।
दीपाली भुबे ने सहकारी अदालत का रुख करते हुए कहा कि सोसायटी की कार्रवाई के कारण उन्हें लगातार असुविधा और परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने अंतरिम राहत की मांग करते हुए जुर्माना रोकने और उन्हें उपयोग करने योग्य पार्किंग स्थान आवंटित करने का अनुरोध किया।
ट्रायल कोर्ट ने पाया कि दीपाली भुबे ने प्रथम दृष्टया अपना मामला साबित किया है और सुविधा का संतुलन भी उनके पक्ष में है। अदालत ने कहा कि यदि राहत नहीं दी गई तो उन्हें अपूरणीय नुकसान हो सकता है। अदालत ने सोसायटी को निर्देश दिया कि मामले के अंतिम निपटारे तक 15 दिनों के भीतर उनके लिए उपयुक्त पार्किंग स्थान निर्धारित कर उपलब्ध कराया जाए। साथ ही, स्वीकृत नक्शे और सोसायटी के उपनियम 165 के अनुसार पार्किंग स्थल तक आने-जाने का रास्ता सुगम रखा जाए।
अपीलीय अदालत ने सोसायटी के इस दावे को भी खारिज कर दिया कि उसे कार्यवाही की जानकारी नहीं थी, जबकि उसे नोटिस दिया जा चुका था। अदालत ने कहा कि इस बात के सबूत मौजूद हैं कि सोसायटी के कानूनी प्रतिनिधि कई सुनवाइयों में शामिल हुए थे।
महत्वपूर्ण रूप से, अदालत ने कहा कि जुर्माना लगाने से पहले सोसायटी ने अपने उपनियमों में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया था। अदालत ने कहा कि उपनियम एक वित्तीय वर्ष में अधिकतम 5,000 रुपये के जुर्माने की अनुमति देते हैं और ऐसा जुर्माना लगाने से पहले संबंधित सदस्य को पूर्व सूचना देना तथा प्रस्ताव पारित करना आवश्यक है।
अंतरिम आदेश में कोई त्रुटि नहीं पाते हुए महाराष्ट्र राज्य सहकारी अपीलीय अदालत ने सोसायटी की अपील खारिज कर दी और माना कि सहकारी अदालत के निर्देश कानूनी और उचित थे। इस फैसले ने दोहराया कि हाउसिंग सोसायटियों को जुर्माना लगाते समय उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए और सदस्यों को अनावश्यक परेशानी से बचाना चाहिए।
