बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को नवी मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (NMIA) के निर्माण से जुड़े पुलों और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के कारण प्रभावित हुए 3,151 पारंपरिक मछुआरों के आजीविका संबंधी नुकसान का आंकलन करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति (HPC) गठित करने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत एम. सेठना की खंडपीठ ने राज्य सरकार को आदेश अपलोड होने के दो सप्ताह के भीतर समिति गठित करने का निर्देश दिया। प्रभावित मछुआरों को अपना दावा पेश करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया जाएगा। इसके बाद समिति को अगले तीन महीने के भीतर दावों की जांच कर उन पर निर्णय लेना होगा।
यह याचिका महाराष्ट्र स्मॉल-स्केल ट्रेडिशनल फिश वर्कर्स यूनियन ने दायर की थी। यूनियन सात कोलीवाड़ों- दिवाले, वाघिवली, पेठ, रोडपाली, बेलपाड़ा, मोठा कांडा और तलोजा के मछुआरों का प्रतिनिधित्व करती है। समिति में सिडको, मत्स्य विभाग, राजस्व एवं वन विभाग, उलवे-पनवेल खाड़ी क्षेत्र की जिम्मेदारी संभालने वाली पुलिस, रायगढ़ के जिलाधिकारी और राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (NIO) के प्रतिनिधि शामिल होंगे। NIO का प्रतिनिधि महाराष्ट्र तटीय क्षेत्र प्रबंधन प्राधिकरण (MCZMA) की ओर से भी प्रतिनिधित्व करेगा।
सुनवाई के दौरान राज्य के महाधिवक्ता मिलिंद साठे ने समिति गठित करने पर सहमति जताई। हालांकि, यूनियन के अध्यक्ष नंदकुमार पवार ने एक और समिति गठित करने की जरूरत पर सवाल उठाया। उन्होंने बताया कि इसी भौगोलिक क्षेत्र में ठाणे क्रीक ब्रिज-III (TCB-III) परियोजना से प्रभावित मछुआरों की शिकायतों की जांच के लिए पहले ही एक समिति गठित की जा चुकी है।
यूनियन ने स्पष्ट किया कि वह एयरपोर्ट परियोजना का विरोध नहीं कर रही है और न ही निर्माण कार्य पर रोक लगाने की मांग कर रही है। यूनियन ने परियोजना के राष्ट्रीय महत्व को स्वीकार करते हुए केवल बुनियादी ढांचा निर्माण कार्य के कारण कथित तौर पर हुए आजीविका के नुकसान के लिए मुआवजे की मांग की है।
विवाद का केंद्र पिलर पर बनाए जा रहे पुलों का निर्माण है। इनमें पनवेल खाड़ी पर बना 1,762.87 मीटर लंबा SBR-9 पुल और उससे जुड़ी अन्य संरचनाएं शामिल हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 25 अक्टूबर को एयरपोर्ट तक कनेक्टिविटी के लिए सिडको द्वारा बनाए गए तीन पुलों का उद्घाटन किया था। इनमें SBR-9 के अलावा पनवेल में गाढी नदी पर बने BR-4 और BR-5 पुल शामिल हैं।
मछुआरों का आरोप है कि पुलों के पिलर बनाने के कारण खाड़ी के जलमार्ग संकरे हो गए हैं। इससे गाद और मलबा जमा हो रहा है, पानी की गंदलापन बढ़ गया है और मछुआरों की पारंपरिक नावों के रास्ते बाधित हो गए हैं।
मछुआरा समुदाय मुख्य रूप से डोल नेट (विशेष प्रकार के जाल) से मछली पकड़ने पर निर्भर है। इस पद्धति में ज्वार-भाटे का नियमित प्रवाह बेहद जरूरी होता है। यूनियन का दावा है कि पानी के बहाव, गहराई और गुणवत्ता में बदलाव से मछलियों के प्रजनन क्षेत्र प्रभावित हुए हैं और मछलियों का मिलना काफी कम हो गया है। यूनियन ने उलवे और गाढी नदियों के प्रवाह को मोड़ने और उनके मार्ग में बदलाव को भी मुहाने की पारिस्थितिकी में परिवर्तन का कारण बताया है।
नंदकुमार पवार ने कहा, “हमारे समुदाय के लोग पीढ़ियों से इन जलक्षेत्रों में मछली पकड़ते आए हैं, लेकिन अब ज्वार-भाटे का प्रवाह बदल गया है, खाड़ी संकरी हो गई है और मछलियों का मिलना लगभग बंद हो गया है। पहले हमारी नावें आसानी से आवाजाही करती थीं, लेकिन अब पानी उथला और कीचड़युक्त हो गया है तथा निर्माण कार्य के कारण रास्ते भी बंद हो गए हैं।”
यूनियन ने जुलाई से सितंबर 2025 के बीच मुआवजे की मांग को लेकर सिडको और अन्य संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया था। हालांकि, सिडको ने 30 अक्टूबर 2025 को इन दावों को खारिज करते हुए कहा था कि उसके निर्माण कार्यों से कथित पर्यावरणीय नुकसान नहीं हुआ है। इसके बाद यूनियन ने 19 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिका में यह सवाल भी उठाया गया कि एयरपोर्ट परिसर से बाहर किए जा रहे बुनियादी ढांचा निर्माण कार्यों के पर्यावरणीय प्रभाव का पर्याप्त आंकलन किया गया था या नहीं। एयरपोर्ट को 2010 में पर्यावरणीय मंजूरी मिल गई थी, लेकिन यूनियन का आरोप है कि व्यापक सड़क नेटवर्क और इंटरचेंज के लिए अनिवार्य अध्ययन, जिनमें त्वरित पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और जल विज्ञान संबंधी अध्ययन शामिल हैं, नहीं कराए गए।
यूनियन ने MCZMA की 2011 की एक सिफारिश का भी हवाला दिया, जिसमें प्रस्तावित सड़क के पास नदी के जल प्रवाह का अध्ययन कराने की मांग की गई थी।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में 16 जुलाई 2021 को मरियायी मच्छीमार सहकारी संस्था मर्यादित बनाम मत्स्य विभाग, महाराष्ट्र एवं अन्य मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में मछुआरों के मुआवजे संबंधी दावों की जांच के लिए समिति गठित करने की व्यवस्था की गई थी।
उस मामले में दिए गए तर्कों और निर्देशों से सहमति जताते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने नवी मुंबई एयरपोर्ट के निर्माण कार्यों से प्रभावित मछुआरों के मुआवजे संबंधी दावों की जांच के लिए भी इसी तरह की व्यवस्था लागू करने का आदेश दिया।
