मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच की यूनिट-12 ने मोबाइल फोन के गोपनीय डेटा की अवैध खरीद-फरोख्त करने वाले एक गिरोह का भंडाफोड़ किया है। इस आरोप में पुलिस ने झारखंड और बिहार में तैनात दो पुलिस कांस्टेबलों को भी आरोपी बनाया है। यह गिरोह कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर), सब्सक्राइबर डिटेल रिकॉर्ड (एसडीआर) और मोबाइल टावर की लोकेशन से जुड़ी जानकारी हासिल कर उसे बेचता था। इस डेटा की मदद से ग्राहक किसी व्यक्ति की गतिविधियों और उसके संपर्कों पर नजर रख सकते थे।
पुलिस उपायुक्त नवनाथ ढवले ने मीडिया को बताया कि पुलिस ने सीडीआर के 50 रिकॉर्ड, 520 मोबाइल ग्राहकों से संबंधित डेटा, लोकेशन के 550 रिकॉर्ड या ट्रैकिंग संबंधी जानकारियां, इंटरनेशनल मोबाइल इक्विपमेंट आइडेंटिटी (आईएमईआई) से जुड़ी 420 जानकारियां और सात मोबाइल फोन जब्त किए हैं।
आरोप है कि गिरोह अलग-अलग उद्देश्यों के लिए अलग-अलग रकम वसूलता था। उदाहरण के लिए, प्रेमी-प्रेमिका या पति-पत्नी के बीच धोखाधड़ी के संदेह से जुड़े मामलों में किसी व्यक्ति की गतिविधियों की जानकारी जुटाने के लिए आरोपियों द्वारा 5,000 रुपये लिए जाते थे।
इस मामले की जांच तब शुरू हुई, जब अधिकारियों ने सोशल मीडिया पर एक विज्ञापन देखा। इसमें पैसे लेकर चोरी हुए या खोए हुए मोबाइल फोन का पता लगाने की पेशकश की गई थी। विज्ञापन देने वाला व्यक्ति खुद को पुलिस अधिकारी बताता था और इंस्पेक्टर संजय के नाम से अपनी पहचान देता था। वह दावा करता था कि वह किसी का खोया हुआ फोन ढूंढने में मदद कर सकता है। इसके लिए वह सीडीआर, एसडीआर और लोकेशन संबंधी जानकारी हासिल करता था। इन जानकारियों से यह पता लगाना आसान हो जाता था कि फोन का इस्तेमाल कौन कर रहा है और वह कहां मौजूद है।
आरोप है कि गिरोह के सदस्य मोबाइल सेवा प्रदाताओं से अवैध तरीके से गोपनीय जानकारियां हासिल करते थे। क्राइम ब्रांच की टीम के संदीप येडे पाटिल और बालासाहेब राउत ग्राहक बनकर गिरोह के सदस्य हंजाला मुबारक सैयद के संपर्क में आए। उन्होंने जोगेश्वरी पश्चिम स्थित एसवी रोड पर उससे मिलने का समय तय किया। सैयद जब वहां पहुंचा, तो पुलिस ने उसे पकड़ लिया।
बालासाहेब राउत ने बताया, ‘‘उसके पास मौजूद दो मोबाइल फोन की जांच करने पर पता चला कि इस गिरोह में कुल नौ आरोपी शामिल हैं। इसके बाद हमने अन्य आरोपियों का पता लगाया और महाराष्ट्र, झारखंड तथा बिहार के अलग-अलग स्थानों से उन्हें हिरासत में लिया।’’
इसके बाद पुलिस ने धनबाद पुलिस में तैनात कांस्टेबल पंकज कुमार शुक्ला और बिहार के वैशाली जिले में तैनात कांस्टेबल प्रिंस कुमार प्रवीण साहनी के खिलाफ भी मामला दर्ज किया। कुछ आरोपी बिचौलियों के रूप में काम करते थे, जबकि दोनों कांस्टेबल महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध कराते थे। बताया जाता है कि वे दूरसंचार कंपनियों से सीडीआर और एसडीआर हासिल करने के लिए संबंधित मोबाइल फोन को किसी अपराध से जुड़ा हुआ बताते थे। इसके बाद इन रिकॉर्ड का इस्तेमाल चोरी हुए मोबाइल फोन का पता लगाने के साथ-साथ पति-पत्नी, प्रतिद्वंद्वियों और कर्मचारियों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए करते थे।
पुलिस का कहना है कि गिरोह उन लोगों को भी रिकॉर्ड उपलब्ध कराता था, जो वैवाहिक विवादों के कारण अपने जीवनसाथी की गतिविधियों और संपर्कों की जानकारी हासिल करना चाहते थे।
एक चौंकाने वाले मामले में, एक कारोबारी के ठिकानों पर जीएसटी अधिकारियों ने छापेमारी की थी। आरोप है कि इसके बाद कारोबारी ने अपने सभी कर्मचारियों और छापेमारी में शामिल अधिकारियों के सीडीआर निकलवाए। उसका मकसद यह पता लगाना था कि छापेमारी की सूचना किसने लीक की थी।
पुलिस ने स्पष्ट किया कि आम नागरिक किसी दूरसंचार कंपनी से सीधे किसी दूसरे व्यक्ति का सीडीआर या एसडीआर हासिल नहीं कर सकते। इन रिकॉर्ड तक पहुंच केवल वैध जांच प्रक्रिया के तहत अधिकृत एजेंसियों को ही निर्धारित नियमों के अनुसार मिल सकती है।
इस मामले में ओशिवारा पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 318 (धोखाधड़ी), 319 (प्रतिरूपण करके धोखाधड़ी), 204 (लोक सेवक का प्रतिरूपण), 223 (लोक सेवक द्वारा जारी वैध आदेश की अवज्ञा), 351 (आपराधिक धमकी), 112 (छोटे संगठित अपराध) और 238 (सबूतों को गायब करना) के तहत FIR दर्ज की गई है। इसके अलावा, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की संबंधित धाराएं भी लगाई गई हैं।
